MANAV DHARM

MANAV  DHARM

Thursday, March 7, 2013

‎"अष्टांग-योग" में "ध्यान" सातवे स्थान पर है..!

‎"अष्टांग-योग" में "ध्यान" सातवे स्थान पर है..!
"ध्यान" की "ध्येय-वस्तु" का ज्ञान तत्वदर्शी-गुरु से प्राप्त होता है..!
"ध्याता" बिना "ध्येय-वस्तु" को जाने "ध्यान" कदापि नहीं कर सकता..!
इसीलिए "ध्येय-वस्तु" को जानने के लिए तत्वदर्शी गुरु की खोज करनी चाहिए...!
समय का कोई-कोई विरल ही ऐसा महान-पुरुष होता है ...जो एक साधक को "अष्टांग-योग" की समस्त विधाओं का सारतः और तत्वतः अभिज्ञान करते हुए "ध्येय-वस्तु" से प्रत्यक्ष-साक्षात्कार करने में समर्थ है..!
जैसे ही "ध्येय-वस्तु" से साधक का प्रत्यक्ष-साक्षात्कार होता है....उसकी सहज-समाधि लग जाती है...!
यही "समाधी" उसको जीवन में निर्द्वंद और निर्लेप कर देती है...और संसार के सभी द्वंदों से परे होकर वह "जीवन-मुक्त" हो जाता है..!

"अहंकार" ही मनुष्य के पतन का कारण है..!

"अहंकार" ही मनुष्य के पतन का कारण है..!
"बुद्धि" की मन के "संकल्प" और "विकल्प" (द्वन्द) का कारण है..!
"मोह" ही समस्त व्याधियो का मूल कारण है!
मानव-मन ही...मनुष्य के "बंधन" और "मुक्ति" का कारण है..!
*****इस प्रकार...मन...बुद्धि..और अहंकार...यह तीनो..ही..मनुष्य के साथ सदैव जीवन पर्यन्त लगे रहते है..!
"मन" का सुक्ष्म-रूप..बुद्धि" और उससे भी सूक्ष्मतर.."अहंकार"...यह मानव-चेतना की सांसारिक प्रकृति है....जो मया-रूपी विष में लिप-पुता रहता है..और जीवन में एक के बाद अनेकानेक क्लेशो को उत्पन्न करता रहता है..!!
*** "आध्यात्म-योग-अभ्यास और साधना से इन्द्रियों के राजा "मन" को नियंत्रण के करके..इसको इन्द्रियों के विषयो से हटाकर..सदगुरु द्वारा बताये गएअष्टांग-योग-क्रिया का जब साधक अभ्यास और साधना करता है..तब...चंचल-मन की सांसारिक प्रकृति शनै.शनै परिवर्तित होने लगती है..और इसकी तात्विक-प्रकृति....अर्थात..चैतन्य-रूप परिष्कृत होकर मानव-जीवन में गुणात्मक-परिवर्तन ला देता है..!

****आवश्यकता है....समय के तत्वदर्शी गुरु (सद्गुरु) की खोज करके उनकी सरनागति प्राप्त करने की....!

यही "सामीप्य-मुक्ति" है..!

**** ॐ श्री गुरुवे नमः......!

"गुरु" ..चेतन-ब्रह्म है..!

"गुरु" ..चेतन-ब्रह्म है..!
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जिस प्रकार पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में परस्पर आकर्षण होता है...ठीक उसी प्रकार..शिष्य का मस्तक...उत्तरी ध्रुव के समान होने से जब चेतन-गुरु के चरण-कमलो ..जो दक्षिणी ध्रुव के समान है...के संसर्ग में आता है....तो..परस्पर-अकर्शाना की क्रिया से ..गुरु की चेतन्य-शक्ति..शिष्य के मस्तक (भृकुटी) को चैतन्य कर देती है..और इस प्रकार....जैसे लोहा जब चुम्बक के संसंर में आकर स्वमेव चुम्बकीय-शक्ति से ओत-प्रोत हो जाता है...वैसे ही..शिष्य का आत्म-जागरण हो जाता है..!
****** गुरु तत्त्व-रूप में ही भक्त के ह्रदय में प्रकट होते है..और स्थूल-रूप में अपना सानिध्य प्रदान करके..भक्त का आत्म-जागरण करते है..!
...गुरु के सानिध्य में आत्म-जागरण ही भक्त की "सामीप्य-मुक्ति है..!

****ॐ श्री गुरुवे नमः...!!

परमात्मा इन्द्रियातीत है...!.........

"चर्म-चक्षुओ" से हम जो भी देखते है..वह सब "माया" का विस्तार है..!
पञ्च-ज्ञानेन्द्रियो से हम जो भी आस्वादन या अनुभव करते है..वह सब "नाशवान" है....क्षण-भंकुर है...आसक्ति ..मोह..भय..और अन्यान्य तमो गुण उत्पन्न करने वाला है..!
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परमात्मा इन्द्रियातीत है...!.........
इन्द्रियाँ परमात्मा की प्राप्ति में साधन नहीं..अपितु..बंधन है..!
जब तक इस स्थूल शरीर में विषयासक्ति उत्पन्न करने वाली इन्द्रियों के रस्ते बंद नहीं होगे...."दिव्य-शक्ति" का अपने अन्तः करण में अनुभव कदापि नहीं हो सकता है..!
****.इन्द्रिय-निग्रह...तभी संभव है..जबकि..इन्द्रियों के स्वामी ?मन" को सतत-साधन और साधना से वश के किया जाय..!
मन..को इन्द्रियों के विषयो से मोड़ कर..गुरु द्वारा बताये गए साधन और साधना-योग के अभ्यास से ही...यह योग सिद्ध होता है..और इन्द्रियों से परे..परम-प्रभु -परमेश्वर की प्राप्ति संभव होती है..!
परम-प्रभु-परमेश्वर की प्राप्ति ही इस मानव जीवन के समस्त कर्मो का ध्येय है..!
*****
ॐ श्री गुरुवे नमः.......!!!

Wednesday, July 18, 2012

गीता ..अध्याय-१२..श्लोक-५..६..७ में भगवान् श्रीकृष्णजी कहते है....

"......जो भक्तजन संपूर्ण कर्मो को मेरे अर्पण करके मेरे सगुन-रूप परमेश्वर को ध्यान-योग से चिंतन करते हुए भजते है ..उन प्रेमी भक्तो को मै शीघ्र ही संसार-सागर से पार उतारने व...ाला होता हु.......!!!"
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****भाव स्पष्ट है..निर्लिप्त-भाव से जो मनुष्य करने-योग्य..कर्तव्य-कर्म को बिना फल की इच्छा किये और इसे परमेश्वर को अर्पित करके कर्म करता हुया...समय के तत्वदर्शी-गुरु द्वार ज्ञान-दिक्धा से प्राप्त "अष्टांग-योग" की क्रप्या विधि से परमात्मा के सगुन-रूप...सद्गुरुदेव्जी..का ध्यान-योग से चिंतन करते हुए भजन-सुमिरण करता है....वह संसार-सागर से शीघ्र ही पार हो जाता है..!
जैसे योग की चार भुजाये है...शंख..चक्र..पद्म..गदा...>>>वैसे ही योग के चार साधन है...ध्यान..स्मरण..मुद्रा और श्रवण-क्रिया..!
सुदर्शन चक्र का ध्यान...
अचिन्त्य..अव्यक्त अक्षर का स्मरण..
मुद्रा द्वारा अमृत-पान..
श्रवण-क्रिया द्वार..अनहद-नाद का श्रवण..!
***उपरोक्त चार साधनों की सिद्धि के लिए "अष्टांग-योग" में कुल आठ सोपान है...
यम..नियम..आसन..प्राणायाम..प्रत्याहार..धारणा..ध्यान..और समाधि..!
***तत्वदर्शी-गुरु की खोज करके जो जिज्ञासु सच्चे ह्रदय और निर्मल-मन से उनकी शरणागति को प्राप्त करता है..वह नीश्चय ही गुरु-कृपा से इस दुर्लभ योग-सिद्धि को प्राप्त कर लेता है..!

Thursday, May 24, 2012

जब तक मनुष्य का मन सांसारिक पदार्थो की तरफ भागता रहेगा..तब तक चित्त को शांति कदापि प्राप्त नहीं हो सकती..!
शांति का अनमोल खजाना तो अन्दर ही है..!
संसार के पदार्थो की प्राप्ति और भोग से क्षणिक  शांति-संतुष्टि मिल सकती है लेकिन..स्थायी या चिर-शांति कदापि नही प्राप्त हो सकती..!
जैसे भूख लगाने पर खाने की इच्छा होती है और भोजन कर लेने पर जब तक खाना हजम नही हो जाता..तब तक फिर खाने की चाह नही रहती..और जैसे ही खाना हजम होता है और भूख फिर लगाती है..तो फिर खाने बैठ जाते है..वैसे ही..इन्द्रियों के विषय-भोग भी बार-बार मनुष्य को भूख-प्यास की तरह सताते रहते है..लेकिन मानव इन सबसे चेताता नहीं..क्योकि..माया का प्रवाल प्रभाव उसकी चेतना को ढके रहता है..!
जैसे ही सत्संग सुलभ होता है और मन क्षण भर के लिए एकाग्र होकर सत्संग-भजन का श्रवण करता है..सुषुप्त -चेतना जाग्रत होने लगाती है..और माया रूपी विष का प्रभाव कम होने लगता है..और चित्त में एक प्रकार की स्थिरता आने लगाती है..यही स्थिरता चेतना की यथार्थ-प्रकृति का वोध करा देती है..!
इसिलए कहा गया ...
बड़े भाग पाईये सत्संग..बिनहि प्रयास होई भाव भंगा..!
बिनु सत्संग विवेक न होई..राम कृपा बिनु सुलभ न सोयी..!
बड़े भाग्य से ही सत्संग सुलभ होता है जहा बिना प्रयास से ही संसार से मोह भंग हो जाता है..और सत्संग के बिना विवेक जाग्रत नहीं होता..यह सत्संग भी प्रभु-कृपा से ही सुलभ होता है..!
आवश्यकता है..जीवन के ध्येय और ध्येय वास्तु को जानने और उसकी प्राप्ति के लिए तहेदिल से प्रयास करने की.....................

Monday, March 19, 2012

मनुष्य का जीवन प्रभु कि अहेतुक कृपा से मिलता है..!

मनुष्य का जीवन प्रभु कि अहेतुक कृपा से मिलता है..!
इस जीवन कि महानता यह है कि..क्षर..अक्षर..और उत्तम यह तीनो तत्व यहाँ इस शरीर में समाये हुए है...!
क्षर वह है..जो यह पञ्च भौतिक शरीर कि रचना में लगा है और नाशवान है..!
अक्षर वह है..जो इस पञ्च भौतिक शरीर को जीवंत रखे हुए है..और जड़-चेतन रूपी ग्रंथि से बंधा हुआ है..!
उत्तम..वह है..जो..क्षर और अक्षर दोनों में होते हुए भी..इससे परे ..निर्द्वंद..निर्लिप्त और निराकार-निष्प्रभ है..केवल..."परमानंदमय" है..!..यहि सबका आश्रय..और सभी उसके आश्रित है..!
***धन्य है..हम सभी  मानव..जिन्हें..यह मानव शरीर मिला है..और भगवद-कृपा से सच्चे तत्वदर्शी गुरु का सानिध्य प्राप्त है..!!
******ॐ श्री सदगुरु चरण कमलेभ्यो नमः........!!!!!!!!