MANAV DHARM

MANAV  DHARM

Wednesday, March 9, 2011

RELIGION IR REALIZATION..!

Religion is absolutely a subjective matter..It is linked straight to the HEART of a Human Being..! Whatever..the people talk or augue. about the Religion .is fully and solely extrovertal gssip and nothing else..because all these reflections and reactions uccure directly from the mind..which is more argumentative than spiritual..! Unless the person joins the SPIRITUALITY i with total devotion and devotion..such gossip will ever remain discarded. by those..who are already on TRUE PATH...! RELIGION IR REALIZATION..!

It is well-established Truth that there dwells a Live-self..form an atom to the ABSOLUTE..!
It is Human Being..who can perceive..realize..attain absorb and assimilate the SUBTLE BEING dwelling deep into the Self..!
The cosmic world..is but a live-manifestation of the ABSTRACT..CONCRETE .SUBTLE and the ABSOLUTE..!
It is a subejct ot per...
ception..realization and absorption through the Divine eye..which is provided by a Real spiritual Master of the time.!
While..the parson opts to attain his/her very self..the process starts from the day..he/she joins the school of the spiritual master.!
So the quest of a real spiritual master is necessary to get spiritual upliftment.!

Tuesday, March 8, 2011

जय..जय..हे.!जय..जय..हे.!.जय..जय..हे जग-जननी..माता..!

जय..जय..हे.!जय..जय..हे.!.जय..जय..हे जग-जननी..माता..!
द्वार तिहारे जो भी आता..बिन मांगे सब कुछ पा जाता...!

तू चाहे तो जीव्वन दे दे ..चाहे तो पल में जीवन ले ले ..!
जनम-मरण सब हाथ में तेरे..तू शक्ति ! हे माता..!! जय जय हे ! जग-जननी माता....!

जब-जब जिसने तुझको पुकारा..तुने दिया माँ ! बन के सहारा..!
और भूले राही को तेरा ही प्यार राह दिखाता...!! जय--जय हे कग -जननी माता..!

भक्त तुम्हारे जग से न्यारे..चरण-कमल-रज निश-दिन धारे..!
त्रिभुवन विदित तुम्हारी महिमा..माँ ! भक्ति-वर डाटा..!! जय--जय हे ..जग-जननी माता...!

जय..जय..हे.!जय..जय..हे.!.जय..जय..हे जग-जननी..माता..!

जय..जय..हे.!जय..जय..हे.!.जय..जय..हे जग-जननी..माता..!
द्वार तिहारे जो भी आता..बिन मांगे सब कुछ पा जाता...!

तू चाहे तो जीव्वन दे दे ..चाहे तो पल में जीवन ले ले ..!
जनम-मरण सब हाथ में तेरे..तू शक्ति ! हे माता..!! जय जय हे ! जग-जननी माता....!

जब-जब जिसने तुझको पुकारा..तुने दिया माँ ! बन के सहारा..!
और भूले राही को तेरा ही प्यार राह दिखाता...!! जय--जय हे कग -जननी माता..!

भक्त तुम्हारे जग से न्यारे..चरण-कमल-रज निश-दिन धारे..!
त्रिभुवन विदित तुम्हारी महिमा..माँ ! भक्ति-वर डाटा..!! जय--जय हे ..जग-जननी माता...!

Friday, March 4, 2011

भक्ति सुतंत्र सकल गुन खानी..बिनु सतंग न पावही प्राणी..!

गीता..अध्याय..११..श्लोक..५२..५३..५४..
भगवान श्रिकेइश्न अर्जुन से कहते है..
हे अर्जुन..मेरा यह चतुर्भुज रूप देखने को अति दुर्लभ है..जिसको की तुने देखा है..क्योकि देवता भी इस रूप को देखने की इच्छा करते है..! ऐसा चतुर्भुज रूप न वेदों से ..न ताप से..न दान से और न यज्ञ से इस प्रकार से देखा जा सकता है..जैसा की तुने देखा है..यह अनन्य भक्ति द्वारा तो प्रत्यक्ष देखा जा सकता है..तत्त्व से जाना जा सकता है..और प्रवेश भी किया जा सकता है..तथा प्रेम से प्राप्त भी हो सकता है..!!
आगे श्लोक..५५ में भगवान कहते है...
" जो मेरा भक्त सब कुछ मेरा ही समझता हुआ सगुन ब्रह्म परमेश्वर के लिए ही कर्म करता है और सर्वभूत प्राणियों में आसक्ति अथवा बैर-भाव से रहित है..वह अनन्य भक्ति वाला पुरुष मुझे प्राप्त होकर परमानन्द को प्राप्त करता है..!"

..इस कलिकाल में अनन्य-भक्ति को प्राप्त करने का केवल एक ही साधन है...वह है..सत्संग..!
रामचरितमानस में संत-शिरोमणि तुलसीदासजी कहते है..
भक्ति सुतंत्र सकल गुन खानी..बिनु सतंग न पावही प्राणी..!
..
बड़े भाग पाइए सतंगा..बिनाहि प्रयास होइ भवभंगा..!
..
बिनु सत्संग विवेक न होइ..राम-कृपा बिनु सुलभ न सोई ..!
इसलिए अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए जिज्ञासु को सत्संग(सत्य-का-संग) करना चाहिए..और एकाग्र व् निर्मल मन से संतो के समीप बैठकर ऊनके कल्याणकारी वचनामृत को सुनना और उसका पान करना चाहिए..!
सार-तत्त्व को ग्रहण करना चाहिए और असार तत्त्व को त्याग देना चाहिए..!
यही सामीप्य-मुक्ति है..!
जब स्वयं गोविन्द की कृपा होगी..तभी ऐसी सत्संगति मिलाती है..और सत्संगति मिलते ही विवेक जाग उठाता है..!
इसलिए कहा है..सत्संगति किम न करोति पुन्शाम...!
ॐ श्री सद्गुरुचरण कमलेभ्यो नमः..!

Thursday, March 3, 2011

परम देव परमेश्वर के ज्ञान से ही दुखो से निवृत्ति संभव है..!

परम देव परमेश्वर  के  ज्ञान  से  ही  दुखो  से  निवृत्ति  संभव है..!
जिस प्रकार  आकाश  को  चमड़े कि भाति लपेटना मनुष्य के लिए संभव नहीं है..उसी प्रकार परमात्मा को बिना जाने दुःख=समुद्र से पार होना  असंभव है.!अतः मनुष्य को दुखो से छूटने के लिए अन्य सभी ओर से मन को हटाकर एकमात्र परमात्मा के ज्ञान की प्राप्ति के साधन में शीघ्र जिज्ञासा  से लग जाना चाहिए...!
जिसकी परम देव परमेश्वर में परम भक्ति है.और कैसी परमात्मा में है  वैसी गी तत्वदर्शी गुरु में है..उसी साधक के ह्रदय में गुरु के द्वारा बताया गया परमात्म-स्वरूप प्रकाशित  होता है.!
उस परमात्मा के ज्ञान के लिए जिज्ञासु तत्वदर्शी गुरु के पास  जाए..!
यहि कारन है की वेदों को सांगोपांग  पढ़ लेने के बाद भी  तत्वदर्शी गुरु के बिना परमात्मा का ज्ञान नहीं होता है..और जब तक परमात्मा के अविनाशी..अव्यक्त-नाम (प्रणव-शब्द) का ज्ञान नहीं होता ..परमात्म-स्वरूप का कोई ध्यान नहीं कर सकता..और  जब तक नाम  और  स्वरूप  में  मन  एकाग्र नहीं होगा  जीवन में कदापि चिर-शांति नहीं  मिल सकती .!
इसलिए  दुःख-समुद्र से छूटने हेतु परमात्मा के नाम  और उनके स्वरूप  के  ज्ञान  के  लिए  जिज्ञासु-भक्त को  तत्वदर्शी गुरु की शरणागत  होना चाहिए..!
 

Tuesday, March 1, 2011

अध्यात्म और विज्ञानं का समन्वय आधुनिक विश्व की जीवंत-आवश्यकता है..!

अध्यात्म  और विज्ञानं का समन्वय आधुनिक विश्व की जीवंत-आवश्यकता है..!
भौतिक-जगत में अधुनातन खोज यदि विज्ञानं का विषय है..तो अंतर्जगत में आत्म-अन्वेषण--अनुभूति अध्यात्म का विषय है..!
विज्ञान जिस क्रिया--प्रतिक्रया के सिद्धांत पार चल रहा है..अध्यात्म में इसका प्रतिपादन
श्रृष्टि के प्रारंभ से ही प्रगट है..!
अध्यात्म और विज्ञानं के सिद्धांत एक ही है..किन्तु कार्य और पूर्ति की दिशाए एक दुसरे के विपरीत है..!
विज्ञान की गति बहिर्जगत में है..जबकि अध्यात्म अंतर्जगत में क्रियाशील है..!
एक अपरा-जगत तो दूसरा परा-जगत में क्रियाशील है.!
विज्ञान कहता है....खोजो..गिर देखो..तब मानो..!
अध्यात्म कहता है....मानो..फिर खोजो तब देखो..!
विज्ञानं में किसी बस्तु-विशेष के अस्तित्व की खोज होने पार जब तक उसको प्रयोग-शाला में सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से नहीं देख-परख लेते है..तब तक उसके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते है...
जबकि अध्यात्म में पहले यह मानते है की परमात्मा है..जो सर्वव्यापक है..फिर उसको अपने घट के अन्दर खोजते है..और उसका फिर दीदार करते है..!
इसप्रकार दिशाए विपरीत है..सिद्धांत एक ही है..!
अध्यात्म कहता है..शक्ति अविनाशी..अजन्मा और सनातन है..विज्ञानं कहता है..शक्ति का न तो सृजन होता है और ना ही इसका नाश होता है..!
विज्ञान कहता है..प्रत्येक क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है..जैसे हम जितने वेग से एक गेद दीवाल की तरफ फेकेगे..वह उतनी ही वेग से फिर वापस लौटेगी..गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत भी इसी पर प्रतिपादित है.!

अध्यात्म भी स्विका करता है..की..जो इस लोक में जन्म लेता है..उसकी आयु पूरी होने पर मृत्यु भी होती है..आया है..सो जाएगा...! जैसा बोयेगा..वैसा ही काटेगा..! अर्थात..द्वन्द यहाँ भी है लेकिन यह सनातन सत्य पर टिका है..!
विज्ञान के आविष्कार ने इलेक्ट्रोनिक्स पर आधारित सूचना-प्रोद्द्योगिकी--दूर--संचार तकनीक विअक्सित कर ली है.जो मूलतः जीवन की एक इकाई..कोशिका में बिखरे हुए एक्क्ट्रोंस--प्रोतोंस नयूत्रोंस के साद्रश्य है..विज्ञान कहता है..प्रत्येक कोशिका का एक केंद्र है..जहा अगाध शक्ति छिपी हुयी है..अध्यात्म कहता है...एक बिंदु से सब कुछ बना है..जो सबका साक्षी है..!
यही सब बीजो-का-बीज है..!
विज्ञानं ने इंसान नहीं बनाया..लेकिन रोबोट बना लिया..पंक्षी नहीं बनाया..लेकिन हवाई-जहाज बना लिया..मछली नहीं बनाया लेकिन पनडुब्बी बना लिया..परखनली में शिशु जन्मा लिया..blood transfusion कर लिया..अन्गंगो का प्रत्यारोपण कर लिया..मौसम पर विजय प्राप्त कर ली..ari condirioner बनाकर सब मौसम एक सामान कर लिया..फिर भी.....गणेश जी की तरह हेड-ट्रांसप्लांट नहीं कर सके..और..अंततः...
जब मानव के घट से स्वानसे निकल जाती है..तो वह कहने लगता है...सॉरी...he is dead..!

इसप्रकार यह सिद्ध है..कि विज्ञान अध्यात्म के बहुत पीछे ही है..!
जो कुछ बाह्य-जगत में हम घटित होते देखते है..वह सब प्रतीकात्मक है..और इसका प्रत्यक्षीकरण अंतर्जगत में अपनी चेतना से चेतना में स्थित होकर एक साधक-योगी सब कुछ नजारा कर केता है..और अपना जीवन धन्य कर लेता है..!

इसीलिए..शधना की आज अप्रतिम..अतीव आवश्यकता है..जिसका ज्ञान तत्वदर्शी-गुरु से ही प्राप्त होता है..!

एषां न विद्या न तपो न दानं..ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्मः..?

सत्य ही कहा है....
"एषां न विद्या न तपो न दानं..ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्मः..?
ते मर्त्यलोके भुविभारभुता....मनुष्यरुपेना मृगाश्चरन्ति..!!"
...अर्थात..ऐसे मनुष्य जिनके पास न विग्या है..न ताप है..न दान है .. न ज्ञान है..न गुन है ..और न धर्म है..वह इस मृत्युलोक में धरती पर भार-स्वरूप है..जो मानव-छोले में होकर भी पशुओ के सात रहते और उनके झुण्ड को चराते है..!
हट-भाग्य है ऐसे मनुष्यों का...!
मधुर बचन है औसधि..कटुक बचन है तीर..!
श्रवण द्वार हवे संचरे ..साले सकल शरीर..!!

सत्यम ब्रूयात..प्रियं ब्रूयात..न ब्रूयात सत्यमप्रियम..!..अर्थात..सत्य बोलो..प्रिय बोलो..किन्तु सत्य और अप्रिय ना बोलो...!
आज के मानव-सभ्यता में व्यक्ति के अन्दर धैर्य--सहिष्णुता विलुप्त होती जा रही है..!
बात-बात पर विवाद खड़े हो जाते है..!
"सत्य" निर्विवाद है.."असत्य" विवाद-ग्रस्त है..!
सत्य का खंडन नहीं होता..असत्य का मंडन नहीं होता..!
हम चाहे जितना भी प्रयास कर ले..सत्य को झुठला नहीं सकते..!
असत्य तभी तक महिमामंडित हो सकता है जब तक कि साक्षात् सत्य से उसका सामना नहीं होता..!
" आदमो आइना नहीं होता..वक्त को कुछ मना नहीं होता..?
झूठ कि जीत होती है तब तक..जब तक सच्चाई से सामना नहीं होत..!
...ऐसे ही का-पुरुष इस संसार में भरे हुए है..साक्षात--सत्य उनकी आँखों के सामने है..फिर भी उनकी आँखे उसमे केवल झूठ ही देख और खोज रही है..!
यही दोष-दृष्टि उनकी अधोगति का कारण है..!