MANAV DHARM

MANAV  DHARM

Wednesday, March 20, 2013

"शब्द" और "श्रुति"....

"शब्द" और "श्रुति"....
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शब्द बिना सूरति अँधेरी..कहो कहा को जाय..!
द्वार ना पावे शब्द का..फिर फिर भटका खाय..!!
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बिना "शब्द" (एकाक्षर-ब्रह्म.) के श्रुति (जीव-मानवीय चेतना ) अंधी है...इतना अंधी है की..शब्द-ब्रह्म-परमेश्वर का द्वार नहीं प्राप्त कर पाती..और बार बार भटकती रहती है..!
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यह शब्द...ही परमेश्वर का पावन-नाम है..जिसे सत-नाम..और  एकाक्षर-ब्रह्म के रूप में भी जाना जाता है..!
यही "महामंत्र" है....जिसे देवाधिदेव महादेव जी माता पार्वती के साथ निरंतर जपते रहते है...
जो सभी अमंगलो का समूल नाश करने वाला और सुमंगालो का निवास-धाम है...!
"मंगल भवन अमंगल हारी..उमा सहित जेहि जपत पुरारी...!!
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इसी शब्द-रूप परमेश्वर का ज्ञाम समय के तत्वदर्शी महान-पुरुष से प्राप्त होता है..!
एक सच्चे जिज्ञासु ..प्रभु प्रेमी-भक्त को यह ज्ञान देकर..उसकी सोयी हुयी चेतना को जाग्रत करके श्रुति(चेतना का सुक्ष्म-रूप) को ह्रदय में विद्यमान "शब्द" से जोड़ने का काम समय के तत्वदर्शी गुरु द्वारा ही..कृपापूर्वक किया जाता है..!
इस घोर मायामय संसार में...माया की इतनी विकराल व्यापकता है..की मनुष्य मात्र बहिर्मुखी होकर अपने जीवन का सुख और शांति..भौतिक जगत के पदार्थो में खोजता फिर रहा है..!
नैसर्गिक और चिरस्थायी सुख और संतुष्टि..तो...शब्द-श्रुति के मिलन से ही संभव है..!
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जीवन को धन्य करना है तो....समय के तत्वदर्शी गुरु की खोज करके उनकी शरागति प्राप्त करे और सच्चे जिज्ञासु होकर निर्मल मन से ज्ञान प्राप्त करके  उस इन्द्रियातीत परमात्मा को अपने ह्रदय में प्राप्त करे..!
शब्द-श्रुति की एकता ही जीव और ब्रह्म का मिलन है...अंश और अंशी का मिलन है..भक्त और भगवान का मिलन है !
*****ॐ श्री गुरुवे नमः....!

Tuesday, March 19, 2013

"भगवान" कौन है..क्या है..??

"भगवान" कौन है..क्या है..??
इस तरह के प्रश्न बहुधा लोग करते रहते है..!
हर कोई भगवान को जानना..देखना और पाना चाहता है...!
लेकिन...."सत्संग" नहीं करना चाहता...किसी कसंत-पुरुष के पास नहीं जाना चाहता..न ही किसी आध्यात्मिक-पुरुष का प्रवचन ही सुनना चाहता है..!
..अरे भाई...! जरा विचार करो...!
कबीर साहेब क्या कहता है.......
"जिन ढूढा तिन पायिया..गहरे पानी पैठी...!
मै बपुरा बुडन दारा रहा किनारे बैठी..!!
.....जिसने खोज..उसने पाया..जो डरा ..सो किनारे पड़ा रहा..!
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते है...
"निर्मम निराकार निर्मोहा..अलख निरंजन सुख संदोहा..!!"
**** परमात्मा...वह सत्य-सनातन-सत्ता-शक्ति है....जो तत्त्व-रूप में निर्गुन-निराकार है..और स्थूल रूप में ...सगुण-साकार रूप में..सृष्टि में हर युग में अवतरित होते है..!
जब जब होई धरम के हानि..बाधे अधम असुर अभिमानी..!
तब तब प्रभु धरी मनुज शरीरा..हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा..!
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इस घोर कलियुग में परमात्मा का प्रगतीकराना मनुष्य-शरीर में  "सदगुरू" के रूप में "समत्व-योग" की पुनर्स्थापना  हेतु हुआ है..!
जिसमे..असत्य से सत्य की और...अन्धकार से प्रकाश की और और मृत्यु से अमरत्व की और ले चलने की क्रिपाये है..!
जिस योग की सिद्धि से माया में संलिप्त मन-इन्द्रिय वश में होकर मानव का चित्त(श्रुति) परमात्मा के शब्द-रूप में एकीकृत होकर उसी में लीन हो जाता है..अर्थात....शब्द-श्रुति की एकता और समता स्थापित हो जाती है ..उसी को "समत्व-योग" कहते है..!
कुल चार मुक्तिया इस मानव जीवन से जुडी है..!
....मनुष्य का शरीर मिलाना.."सालोक्य-मुक्ति *है..!
....सदगुरू का मुलाना "सामीप्य-मुक्ति" है..!
..."शब्द-श्रुति" में समता स्थापित हो जाना.."सारुप्य-मुक्ति" है..!
..."शब्द-श्रुति" की एकता में मन को लीन करके शरीर छोड़ना "सायुज्य-मुक्ति" है..!
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भाव स्पष्ट है...
भगवान् को पाना और जानना है तो..ग्यानी गुरु (समय के सदगुरू) की खोज करके समत्व-योग..जिसे गीता में आत्म ज्ञान  कहा गया है..का क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए..!
इसी क्रियात्मक ज्ञान के अभ्यास और साधना से..परमात्मा के तत्त्व-रूप का प्रकातीकराना साधक के ह्रदय में होता है..और उसका सर्वस्व रूपन्तरण हो जाता है..!अंत काल में वह आवागमन के चक्र से छुट कर परमात्म-तत्त्व में विलीन हो जाता है..!
इस प्रकार...चार मुक्तियो को देने वाले भगवान..कही और नहीं..मनुष्य के अन्दर ही विद्यमान है..और..जैसे पतंग में डोर लगाने वाला कोई हाथ होता है और बिना डोर लगे पतंग उड़ नहीं सकती..वैसे ही..भगवान् से कटे हुए मानव-मन को शब्द-रूपी डोर में सदगुरू ही बांधते है..और जैसे ही यह डोर बंध जाती है...मानव चेतन अपने पंखो से उड़ती हई हृदयाकाश में विद्यमान परमात्मा से जा मिलाती है..!
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इस लिए..हे मानव....उठो...जागो..और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो..!
परमात्मा की प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य है..!
....ॐ श्री गुरुवे नमः....!

Monday, March 18, 2013

ईश्वर की प्राप्ति......!

ईश्वर की प्राप्ति......!

जो सभी ऐश्वर्यों का सवामी...एकरस...चिन्मय...सत-चित-आनंद स्वरूप..निर्मम..निराकार.निर्मोही...निष्प्रभ और अलौकिक है.....वाही परम-प्रभु-पतामेश्वर यत्न-पूर्वक....अपनी चेतन से..चेतन में स्थित और स्थिर हो जाने पर ..हृदयाकाश में दैदीप्यमान है..!
गुरु नानकदेवजी कहते है..
"जे सौ चन्दा उगवे..सूरज चढ़े आकाश......
ऐसा चदन होडिया..गुरु बिनु घोर अंधार....!
...हृदयाकाश में ऐसा अलौकिक दैदीप्यमान प्रकाश है...जिसके आगे सैकड़ो सूरज और चन्द्रमा के प्रकाश भी फीका है...!
लेकिन गुरु-कृपा के बिना इसकी प्राप्ति असंभव है..!
******
परमात्मा कही और नहीं..अपने अन्दर ही है...!
संत ब्रह्मनान्दजी कहते है....
"घट भीतर उजियारा साधो..घट भीतर उजियारा रे....
पास बसे अरु नजर न आवे ढूढ़त फिरत गवारा रे.......!!!
.........
तभी संतो ने समझाया.....
ज्यो तिल माहि तेल है..ज्यो चकमक में आग..
तेरा साईं तुझमे...जाग सके तो जाग.....!!
*****
इसलिए हे मानव...उठो..जागो..और पाने अन्दर विराजमान परमेश्वर को सत्संगति..गुरु-कृपा और सतत-साधना से प्राप्त करके अपना मानव जीवन धन्य करो..!

***ॐ श्री गुरुवे नमः....!!

जो गुरुओ के भी गुरु है..वही सदगुरु है..!

जो गुरुओ के भी गुरु है..वही सदगुरु है..!
जो सत्य का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन कराने में सक्षम है वही सदगुरु है..!
जो आवागमन के चक्र से मुक्ति  प्रदान करने में समर्थ है..वही सदगुरु है..!
जो आत्म-ज्ञान देकर शब्द-श्रुति की एकता में चित्त को स्थिर और स्थित करके जीव और ब्रह्म का मेल करा दे..वाही समय के सदगुरु है..!..तत्वदर्शी महान-पुरुष है...!!
*****
कहता था..कहे जात था..
लोक वेड के साथ..!
पड़े में सतगुरु मिले..
दीपक दीन्हा हाथ..!
दीपक दीन्हा हाथ करि..
वास्तु दई लखाय..!
कोटि जनम का पंथ था..
पल में पंहुचा जाय..!
....भाव स्पष्ट है...
सदगुरु की कृपा से कोटि जन्म में भी जो मंजिल हासिल नहीं हो सकती है..वहा पल में ही जीव पहुच जाता है..!
ऐसे सद्गुरुदेव्जी के श्री-चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम है..!!

Wednesday, March 13, 2013

...बिनु हरि कृपा मिलहि नहि सांता...!

रामचरितमानस में विभिशाना-हनुमानजी का मिलन इन शब्दों में संत शिरोमणि तुलसीदासजी द्वारा किया गया है..!......

अब मोहि भा भरोस हनुमंताजो रघुवीर अनुग्रह कीन्हा..सो ..तुम्ह मोहि दरस हठी दीन्हा...!!

*****
भाव स्पष्ट है.....
हरि-कृपा से ही संत-महान-पुरुषो का मिलन होता है..!
प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने विभिशाना पर अनुग्रह किया ..इसलिए हनुमानजी ने ब्राह्मण भेष में उन्हें दर्शन दिया..!
प्रभु की अहेतु की कृपा हर जीव पर रहती है..तभी तो इस संसार में मानव शरीर पाकर जीव की चौरासी लाख योनियो की यंत्रणा से मुक्ति मिली है..!
जब हरि कृपा से संत-महान पुरुष का मिलन इस मानव शर्तीर से होगा....तब..माया-रूपी विष धीरे धीरे निष्प्रभावी होने लगेगा...और मुक्ति-मार्ग प्रशस्त होता जायेगा......!

संत महान पुरुष सदैव ही सुलभ रहते है...
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा...सेवत सादा समन कलेसा..!
अकथ अलौकिक तीरथराऊ ..देहि सद्य फल प्रगट प्रभाउ..!!
यह एक ऐसा अलौकिक तीर्थ है..जहा जब मानव पहुच जाता है..तो सेवा का तत्चना फल मिलाता है..और सभी क्लेशो का नाश हो जाता है..!!

****ॐ श्री गुरुवे नमः.....!!

ईश्वर की प्राप्ति......!

ईश्वर की प्राप्ति......!
जो सभी ऐश्वर्यों का सवामी...एकरस...चिन्मय...सत-चित-आनंद स्वरूप..निर्मम..निराकार.निर्मोही...निष्प्रभ और अलौकिक है.....वाही परम-प्रभु-पतामेश्वर यत्न-पूर्वक....अपनी चेतन से..चेतन में स्थित और स्थिर हो जाने पर ..हृदयाकाश में दैदीप्यमान है..!
गुरु नानकदेवजी कहते है..
"जे सौ  चन्दा उगवे..सूरज चढ़े आकाश......
ऐसा चदन होडिया..गुरु बिनु घोर अंधार....!
...हृदयाकाश में ऐसा अलौकिक दैदीप्यमान प्रकाश है...जिसके आगे  सैकड़ो सूरज और चन्द्रमा के प्रकाश  भी फीका  है...!
लेकिन गुरु-कृपा के बिना इसकी प्राप्ति असंभव है..!
******
परमात्मा कही और नहीं..अपने अन्दर ही है...!
संत ब्रह्मनान्दजी कहते है....
"घट भीतर उजियारा साधो..घट भीतर उजियारा रे....
पास बसे अरु नजर न आवे ढूढ़त  फिरत गवारा रे.......!!!
.........
तभी संतो ने समझाया.....
ज्यो तिल माहि तेल है..ज्यो चकमक में आग..
तेरा साईं तुझमे...जाग सके तो जाग.....!!
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इसलिए हे मानव...उठो..जागो..और पाने अन्दर विराजमान परमेश्वर को सत्संगति..गुरु-कृपा और सतत-साधना से प्राप्त करके अपना मानव जीवन धन्य करो..!
***ॐ श्री गुरुवे नमः....!!

Friday, March 8, 2013

हरि सा हीरा छाडि के ..करे आन की आस..!

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हरि सा हीरा छाडि  के ..करे आन की आस..!
ते नर जमपुर जाइहे...सत भाषे  रैदास........!!
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....सनत रैदास जी कहते है....
परम-प्रभु परमेश्वर  रूपी हीरे को त्याग कर जो मनुष्य किसी एनी वास्तु की अभिलाषा करता है...वह अधोगामी होकर यमपुर की यातना सहता है..और अंत में नर्क को प्राप्त हित है..!
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भाव स्पष्ट है....
जो प्राप्त करने योग्य है..वाही "प्रभु-रूपी हीरा (प्रसाद) है...!
जो त्याज्य है..वाही आस्वक्ति-रूपी अभिलाषाए ( यातना) है..!
एक उर्ध्वगामी है..जो निवृत्ति-मार्ग पर ले जाती है..और जीवन-मुक्त कर देती है..!
एक अधोगामी है...जो प्रवृत्ति-मार्ग पर लपेट कर सुख०दुख और राग-द्वेषादि के बंधन में जकड देती है..!
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हे मानव...! जो प्राप्त करने का ध्येय है..उसे जानो .. और प्राप्त करने का सत्प्रयास करो...!
 .जो त्यागने योग्य है..उसका पर्त्याग करके जीवन को बंधन-मुक्त कर लो..!
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