MANAV DHARM

MANAV  DHARM

Thursday, September 29, 2011

मानव जीवन की सार्थकता

मानव जीवन की सार्थकता इसी में है..कि ..हम अपने सत्कर्मो से इहलोक और परलोक दोनों को संवार  ले..!
यह भौतिक जगत  में ज्ञान-रथ पर आरूढ़ होकर निर्लिप्त-भाव से सारे मानवोचित कर्मो को करते हुए संसार-सागर में तरते रहना और नततः इस पञ्च-भौतिक शरीर में समाई हुयी चेतना-शक्ति से परम-चैतन्यता की स्थिति में चैतन्य-महाप्रभु ..परम-पिता-परमेश्वर में लीन हो जाना ही  मानव-जीवन का परम-ध्येय है..!!

Tuesday, September 27, 2011

Human life is a great gift of Almighty..!

Human life is a great gift of Almighty..!
It is up to the human  being..either to make this life a  "thing of joy for ever " or to stick to exploiting it for this or that reason..!
Essentially LIFE has a reason ..to know..explore..seek..and attain.." Who am I ? "
This can be possible only when..we are onset to get first hand information about aour "spiritual-self".!
We know only one aspect of our existence..that is..The physical appearance and shape..!
Behind this physical curtain..our subtle shape is veiled..wherein dwells a deep ocean of eternal pleasure and peace..!
We can not view this subtle shape through our mortal eyes..!
There is a subtle or divine eye already inherent in our human body..!
It is the Spiritual master or Guru..who dissects this subtle eye and ikkuminates the dormant conscience of the person ..!
Human mind..while it wanders extrovert..is the root cause of our dualistic nature ..attitudes and activities..and when it is diverted entrover..it becomes unitary..sustainable and subtle..!
There is a practical way to get through the evolution of the spiritual-self..!
It is known as Spiritual-knowledge or "Atm-Gyan ".!
This is revealed by the living spiritual master ..!
The only way to fetch a spiritual master is constant and regular satsang..in the nearness of saintly person and enlightened personalities..!
Once such nearness is availed and enjoyed regularly with devotion and dedication..the search for a GURU will be in easy reach..!

Great are those who prosper in spiritual knowledge..!
Long Live Spirituality and spiritual master of the era..!






Bhagvad Gita..chapter-9..shlok..4..5..6..
 Lord shrikrishna..explains about HIS all-pervading existence to Arjun..>>
He says to Arjun.."This world is undoubtably manifested and sustained into ME ..unexplicitelt alongwith  overall mortal elements..but I am not sustaiined into it.. Just look my influence..that..MY ATMA..which fenerates  all-mortal-elements..does not exist into ME..! Just all-pervading air..while it sustains in the sky..moves everywhere..likewise..MY Atma has enveloped the whole mortal elements and beings..!"

Substaintially enough..Almighty..the GOD..is omni-present..and hence He dwells into aour ATMA..!HE is the prime cause of our birth and death..! One..who adores HIM alongwith his Atma..and offers his whole life to HIM..He is saved..! this happens only when the descipline dedicates himself with perfect devotion by virtue of self-transcendance..and the equillibrium of BREATH..!..Otherwise it is futile to  offer adoration  without devotion..!
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Wednesday, September 14, 2011

"अष्टांग-योग"

"अष्टांग-योग" की सफल-साधना से ही साधक के जीवन में "समाधि" घटित होती है..!
वह कुल धन्य है..वह माता-पिता धन्य है..वह जीवन धन्य है..वह गुरु धन्य है..वह घर धन्य है..जहां पार
ऐसे "साधक' ..अपनी साधना में सदैव-तत्पर रहते है ...!!

Thursday, August 18, 2011

God is omni-present

God is omni-present..just like Great-Air..sustained in the sky..moves without interrut\ption everywhere..likewise..God dwells in whole mortal-elements and human -beings..! HIS apparant-realization is a matter of Spiritual-upliftment..! when the aspirant attains equillibrium of breath and get sustained into it..the realization emerges like a sweet-delight known as BLISS..!!

Monday, July 11, 2011

तुलसी जग में आई के कर लीजे दो काम..!

"तुलसी जग में आई के कर लीजे दो काम..!
देने को टुकड़ा भला लेने को हरि नाम..!!"
***भव स्पष्ट है..इस संसार में मानव-तन पाकर दो काम अवश्य ही कर लेना चाहिए..!
पहला तो एक हाथ से दान अर्पण और दूसरा तो..दुसरे हाथ से ज्ञान-ग्रहण..!
इन दो हाथो की उपयोगिता..लेने और देने में ही है..!
जैसे जब हम कोई बस्तु बाजार से खरीदते है..तो पहले उसका मूल्य चुकाते है..तभी वह बस्तु हमें मिलती है..ऐसे ही..आध्यात्मिक दृष्टि से...जब तक हम..गुरु-दक्षिणा में अपने-आप्नको..अपने मन को..श्रीगुरुदेव महाराज जी के चरणों में अर्पित मही
करेगे..तब तक हमें कल्याणकारी-ज्ञान सुलभ नहीं हो सकता है..!
कबीर साहेब कहते है...
"मन दिया सो तिन्ह दिया..मन के लार शरीर..!
अब देवे को कछु है नहीं कह गए दास कबीर..!!
मन के हारे हार है..मन के जीते जीत..!
कगे कबीर हरि पाईये..मन ही के परतीत..!!"
जिसने अपने मन को श्री सदगुरुदेव जी के श्री चरणों में अर्पित कर दिया..उसने सर्वस्व दान कर दिया..उसके पास देने को कुछ भी शेष नहीं राहा..!
कबीर साहेब कहते है..मन के हारने से हार है..और मन के जिताने से जीत है प्रभु जी को पाना है तो..मन (चेतना) की अनुभूति में ही प्रभु को प्राप्त करो..!
***इसीलिए संतो ने कहा...' मनैव मनुष्याणाम..करणं बंध मोक्षयो..."
यह मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है..!
बहिर्मुखी होकर हम बंध जाते है..और जब हम अंतर्मुखी हो जाते है..तब हमारे कल्याण के दरवाजे खुल जाते है..!
इसलिए मन को श्री गुरुदेव जी के श्री चरणों में अर्पित करके हमें अपना कल्याण करना चाहिए....!

Friday, June 17, 2011

जीवन को सम्पूर्णता में जीना है तो ..अपने-आप को जानो..!

जीवन को सम्पूर्णता में जीना है तो ..अपने-आप को जानो..!
"...मै कौन हूँ...?"
क्या मै..केवल मात्र एक स्थूल-पिंड हूँ..?
नहीं..नहीं..मै अपने-आप में ब्रह्माण्ड हूँ..!!
कैसे..??
जैसे अपने स्थूल-नेत्रों से हम घूम-घूम कर सारा भूमंडल देख लेते है..किन्तु अपने चहरे को देख नहीं सकते बल्कि..यत्न-पूर्वक एक दर्पण का सहारा लेते है..वैसे ही अपने अन्दर छिपे हुए ब्रह्माण्ड को सिखाने के लिए हमें गुरु रूपी दर्पण की जरुरत है..!
इसीलिए कहा गया..को पिंड में है वह ब्रह्माण्ड में है...और जो ब्रह्माण्ड में है वह पिंड में है..!
एक को हम स्थूल नेत्रों से देखते है..दुसरे को हम दिव्य-नेत्र से देखते है..!
स्थूल-पिंड नश्वर है..दिव्य-ब्रह्माण्ड नित्य है सनातन है शाश्वत है..!
एक लौकिक है..दूसरा पारलौकिक है..!
इस प्रकार इस मानव-देह के दो पहलू है..एक भौतिक(अपरा)..दूसरा शाश्वत(परा_)..!
एक को हम जानते है..इसी के साथ जीते-मरते है ..
दुसरे को हम नहीं जानते ..और जानना भी नहीं चाहते..??
यही मानव का दुर्भाग्य है..वह नाशवान..अनित्य के पीछे दौड़ रहा है..जो शाश्वत-सनातन है..और थोड़े से सत्प्रयास से हासिल हो सकता है..उसको हम जानना और पाना नहीं चाहते..!
जैसे ही हमें यह शाश्वत लोक अपने भीतर मिल जायेगा..हमारी शारी उद्ग्निता..शोक..क्लेश और विपन्नता..सदा-सर्वदा के लिए समाप्त हो जाएगी..!
आईये...हम अपने आप को जाने.."हम..पिंड ही नहीं..अपितु ब्रह्माण्ड भी है.."...!!

Wednesday, June 15, 2011

मानव जीवन की सम्पूर्णता..!

मानव जीवन की सम्पूर्णता..!
रामचरित मानस में संत-शिरोमणि तुलसीदासजी कहते है....
"नर तन सम नहीं कवनेहु देही..जीव चराचर जचत जेही..!
सरग नरक नसैनी नसैनी..ज्ञान विराग भक्ति सुख देनी..!
अर्थात..मनुष्य के शरीर के समान दूसरा कोई शरीर नहीं है..इस शरीर की याचना चराचर जीव करते रहते है..क्योकि..यह शरीर ही स्वर्ग..नरक और मोक्ष की सिद्दी है..और इस शरीर में ज्ञान..वैराग्य और भक्ति क सुख निहित है..!
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स्पष्ट है..ऐसे अनमोल मानव-शरीर को प्राप्त करके भी आज क मानव ज्ञान..वैराग्य और भक्ति के सुख से बंचित है..!
भगवान श्रीरामचंद्रजी कहते है...
"बड़े भाग मानुस तन पावा..सुर दुर्लभ सद ग्रंथन्ही गावा..!
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा..पाई न जेहि परलोक सवारा..!
अर्थात..मनुष्य क शरीर बड़े भाग्य से मिलता है..यह देवताओं को भी दुलभ है..! यह साधन (तत्व-साधना) क घर है..ऐसा कौन मनुष्य है..जो इस दुर्लभ शरीर को पा कर भी अपना परलोक नहीं सवारना चाहता..??
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इस पञ्च-भौतिक और त्रिगुणात्मक मानव शरीर में मन रूपी तंत्र ही बंधन और मोक्ष क कारण है..!
मन के बेलगाम घोड़े को नियंत्रित करने के लिए "अंकुश" की आवश्यकता है..!
मन जब तक बहिर्मुखी रहता है..मानव-शरीर के विभिन्न द्वार खुले रहते है.और विषय-भोग अन्दर प्रवेश करते रहते है..!
जैसे ही यत्न-पूर्वक मन को अंतर्मुखी बनाने क साधन सदगुरु की कृपा से प्राप्त हो जाता है..तो एकाग्रता की स्थिति में बिखरी हुयी चेतना सिमटने लगती है..और इस चेतना की शक्ति से हम चेतना को ही देखने और अनुभव करने लगते है..!
हमें तब यह पता चलता है..की हम हाड-मांस के पुतले मात्र ही नहीं बल्कि एक स्वयं-संपूर्ण आत्मा है..!
यह आत्मा ही परमात्मा क अंश है जो..अपनी स्वाभाविक प्रकृति वश उर्ध्व मुखी होकर अपने अंशी (परम-तत्वम-परमात्मा ) से मिलना चाहती है..किन्तु मानव की बहिर्मुखी प्रवृत्ति इसे अधो मुखी बनाये रहती है..!
अंश (आत्मा) का अंशी (परमात्मा) से मिलना ही जीवन की सम्पूर्णता है..!
यह तभी संभव है..जब की इस भौतिक शरीर से परे इसमे अन्तर्निहित आध्यात्मिक शरीर को हम समय के तत्वदर्शी गुरु से जानकर अष्टांग-योग के साधन द्वारा अपनी चेतना को अंतर्मुखी करके हम चेतना में ही स्थित हो जय.!
जैसे गंगा जी गंगोत्री हिमनद से निकल कर अपनी लम्बी यात्रा पूरी करके अनत में गंगा सागर में मिल जाती है..तो गंगा-जल का सारा कोलाहल समाप्त होहक वहां गंगाजी का नामोनिशान मिट जाता है..और वहां केवल सागर का जल ही जल दृष्टिगोचर होता है..वैसे ही जब एक साधक अपनी आत्मा से साधना की प्रखरता में पहुँच कर जब परम-तत्वतम परमात्मा में लीन हो जाता है..तो उसकी शारी उद्विग्नत..अशांति..सदा-सर्वदा के लिए मिट जाती है..!
*******ॐ श्री सदगुरु चरण कमलेभ्यो नमः....!!!!