MANAV DHARM
Thursday, January 13, 2011
Tatva--varnan...!!
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है...."".हे अर्जुन..! पंचभूतों से निर्मित यह शारीर ही क्षेत्र है....जिसमे पांचो कर्मेन्द्रिया ही अधिभूत...पांचो ज्ञानेन्द्रिया ही अधिदेव है तथा इसमें प्रवाहित प्राण ही अधियज्ञ है...!! इस क्षेत्र का ज्ञाता ही क्षेत्रज्ञ है...!!
मै ही यह क्षेत्र..और क्षेत्रज्ञ....अधिभूत..अधिदेव..और अधियज्ञ..हू...!!
सभी कुछ मेरे से ही उय्पन्न हुआ जान...!!""
इस प्रकार यह मानव शारीर ही परमात्मा का घर है...जिसमे निरंतर यज्ञ हो राहा है..!! जो इस शारीर को तत्त्व से जान लेता है..वह सब कुछ जान जाता है..!!
satsang ganga..!
ज्ञान क्या है..??
ज्ञानी कौन है..??
सदगुरुदेव महाराज जी के शब्दों में.....अध्यात्म की अनुभूति ही ज्ञान है...और जो इस अनुभूति को प्राप्त कर letaa है वही ज्ञानी है...!!
ज्ञानी कौन है..??
सदगुरुदेव महाराज जी के शब्दों में.....अध्यात्म की अनुभूति ही ज्ञान है...और जो इस अनुभूति को प्राप्त कर letaa है वही ज्ञानी है...!!
Wednesday, January 12, 2011
Naam--Mahima....!!
नाम--सुमिरन की महिमा......
चिता है सतनाम की..और न चितवे दास..!
जो चिंता है नाम बिन..सोई काल की फास...!!
नाम लिया तिन्ह सब लिया..सकल वेद का भेद..!!
बिना नाम नरके पडा..पढता चारो वेद...
कोटि नाम संसार में ताते मुक्ति न होय..!
आदि नाम जो गुप्त जप..बुझे विरला कोय..!!
शब्द बिना सूरत अँधेरी..कहो कहा को जाय..!
द्वार न पावे शब्द का फिर--फिर भटका खाय..!!
मंगल भवन अमंगलहारी...उमा सहित जेहि जपत पुरारी...!!
सहस्र नाम सुनि शिव--बानी...जप ज़ेही शिव संग भवानी...!!
राम एक तापस तिय तारी नाम कोटि सत कुमति सुधारी...!
कहो कहा लगि नाम बड़ाई..राम न सकहि नाम गुण गई..!!
..........आदि सच..जुगादि सच..नानक है भी सच और होसी भी सच......!!
चिता है सतनाम की..और न चितवे दास..!
जो चिंता है नाम बिन..सोई काल की फास...!!
नाम लिया तिन्ह सब लिया..सकल वेद का भेद..!!
बिना नाम नरके पडा..पढता चारो वेद...
कोटि नाम संसार में ताते मुक्ति न होय..!
आदि नाम जो गुप्त जप..बुझे विरला कोय..!!
शब्द बिना सूरत अँधेरी..कहो कहा को जाय..!
द्वार न पावे शब्द का फिर--फिर भटका खाय..!!
मंगल भवन अमंगलहारी...उमा सहित जेहि जपत पुरारी...!!
सहस्र नाम सुनि शिव--बानी...जप ज़ेही शिव संग भवानी...!!
राम एक तापस तिय तारी नाम कोटि सत कुमति सुधारी...!
कहो कहा लगि नाम बड़ाई..राम न सकहि नाम गुण गई..!!
..........आदि सच..जुगादि सच..नानक है भी सच और होसी भी सच......!!
Thursday, January 6, 2011
Manav Dharma....!
What is RELIGION.??
tHIS IS A VERY RELEVANT QUESTION..
MOSTLY PEOPLE ARE CONFUSED DEFINING THE ACTUAL IDENTITY OF rELIGION.
Religion is a subjective as well as an objective matter.
While we take the personal aspect of religion..it takes the shape of subjective religion..whereas when we look it in broader aspect..is grows to be objective one..!
A person follows some well-defined customes in his day-to-day life which is traditionally acknowledged..So it is normally termed as his duties deemed to be performed on priority basis.
While looking in broader aspect..Religion takes the shape of actual objectivity..In defining the word "To rely On general or an universal matter " is the widely spoken word..!! hence Religion stands for an UNIVERSALLY ACKNOWLEDGED ELEMENT..i.e. Subject of Universal LIfe..!
Thus religion is a matterialised thing which prevails each and every particle of this creation....Aves,,Pisces..Amphebians..Animals..Homosapians..all chordates..vertevrates..thallophytes..pteridothytes..vegitations..living and non-living creation..alike..!!
It is the PRIMORDIAL VIBRATION..in essence which prevails alike inthe whole universe..
This primitive n primary ingredient identifies univarsality between..human beings..!
so what we have taken up to us alike which can not be differentiated is the Real Religion.!It is the Soul..>>..Atma..which exists alike in every human being irrespective of caste,,creed,,community,,culture,,custom,,country,,contradictions,,conscience,,complexion,,gender,,age,,lifestyle,,
traditiun..etc..
So truly speaking ut is the HUMANITY or " Manav Dharma " which is the most relevant religion to be followed ..!!
So we are MAANAV DHARMIK..!
tHIS IS A VERY RELEVANT QUESTION..
MOSTLY PEOPLE ARE CONFUSED DEFINING THE ACTUAL IDENTITY OF rELIGION.
Religion is a subjective as well as an objective matter.
While we take the personal aspect of religion..it takes the shape of subjective religion..whereas when we look it in broader aspect..is grows to be objective one..!
A person follows some well-defined customes in his day-to-day life which is traditionally acknowledged..So it is normally termed as his duties deemed to be performed on priority basis.
While looking in broader aspect..Religion takes the shape of actual objectivity..In defining the word "To rely On general or an universal matter " is the widely spoken word..!! hence Religion stands for an UNIVERSALLY ACKNOWLEDGED ELEMENT..i.e. Subject of Universal LIfe..!
Thus religion is a matterialised thing which prevails each and every particle of this creation....Aves,,Pisces..Amphebians..Animals..Homosapians..all chordates..vertevrates..thallophytes..pteridothytes..vegitations..living and non-living creation..alike..!!
It is the PRIMORDIAL VIBRATION..in essence which prevails alike inthe whole universe..
This primitive n primary ingredient identifies univarsality between..human beings..!
so what we have taken up to us alike which can not be differentiated is the Real Religion.!It is the Soul..>>..Atma..which exists alike in every human being irrespective of caste,,creed,,community,,culture,,custom,,country,,contradictions,,conscience,,complexion,,gender,,age,,lifestyle,,
traditiun..etc..
So truly speaking ut is the HUMANITY or " Manav Dharma " which is the most relevant religion to be followed ..!!
So we are MAANAV DHARMIK..!
Wednesday, January 5, 2011
Guru--Bandana...!!
---->>---गुरु--बंदना---->>..
बंदौ गुरु--पद--कंज..कृपासिंधु--नर--रूप हरि..!
महामोह--तम--पुंज जासु बचन रवि करनी--कर..!!
त्वमेव माता च पिता त्वमेव..त्वमेव बन्धुश्चासखा त्वमेव..!
त्वमेव विद्याद्रविनमा त्वमेव..त्वमेव सर्वं माम्देवादेवः..!!
बन्देबोधामायाम नित्यं..गुरुशंकर रुपिनम
यामाश्रीतोही..बक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र बंदते..!!..!
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमाहेश्वारह..!
गुरुर्सक्शातापरामाब्रह्मः..तस्मै श्रीगुरुवेनमः....!!
अन्धाकरातिमिरंधास्य..ग्यानान्जनाशालाकया..!
चक्शुरुमिलिति येन तस्मे श्रीगुरुवे नमः..!!
अखान्दमंदालाकारम..व्याप्तं..येन चराचरम..!
तत्पदादार्षित येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः..!!
शान्ताकारम..भुजगशयनम..पद्मनाभं सुरेशं..!
विश्वाधारं..गगानासद्रिषम..मेघवर्ण शुभान्गम..!
लक्शिकनतम कमालानायम योगिभिर्ध्यानागाम्यम !
बन्दे विष्णु भवभय हरनाम सर्वलोकेप नाथं..!!
एकं नित्यं विमलाचालम..सर्वदासक्षिभूतम..!
भावातीतं..त्रिगुनाराहितम..सदगुरुम..तं नमामि..!!
बंदौ गुरु--पद--कंज..कृपासिंधु--नर--रूप हरि..!
महामोह--तम--पुंज जासु बचन रवि करनी--कर..!!
त्वमेव माता च पिता त्वमेव..त्वमेव बन्धुश्चासखा त्वमेव..!
त्वमेव विद्याद्रविनमा त्वमेव..त्वमेव सर्वं माम्देवादेवः..!!
बन्देबोधामायाम नित्यं..गुरुशंकर रुपिनम
यामाश्रीतोही..बक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र बंदते..!!..!
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमाहेश्वारह..!
गुरुर्सक्शातापरामाब्रह्मः..तस्मै श्रीगुरुवेनमः....!!
अन्धाकरातिमिरंधास्य..ग्यानान्जनाशालाकया..!
चक्शुरुमिलिति येन तस्मे श्रीगुरुवे नमः..!!
अखान्दमंदालाकारम..व्याप्तं..येन चराचरम..!
तत्पदादार्षित येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः..!!
शान्ताकारम..भुजगशयनम..पद्मनाभं सुरेशं..!
विश्वाधारं..गगानासद्रिषम..मेघवर्ण शुभान्गम..!
लक्शिकनतम कमालानायम योगिभिर्ध्यानागाम्यम !
बन्दे विष्णु भवभय हरनाम सर्वलोकेप नाथं..!!
एकं नित्यं विमलाचालम..सर्वदासक्षिभूतम..!
भावातीतं..त्रिगुनाराहितम..सदगुरुम..तं नमामि..!!
Gyan--Ganga..!
आत्म--तत्त्व की तत्वतः अनुभूति प्राप्त करना ध्येय बस्तु ..है..यह साशक की साधना और सदगुरु--कृपा पर निर्भर काता है..!
जब तक शब्द और श्रुति का मेल नही होता तब तक भक्त के ह्रदय में ज्ञान उद्घाटित नही होता.!
जिस भक्त को गुरु--कृपा प्राप्त हो जाती है..वह ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो जाता है..!
ज्ञानेन मुक्तिः...ज्ञान से ही मुक्ति होती है..जब तक जिज्ञासु को ज्ञान की आधारशिला नही बतायी जायेगी..वह ज्ञान प्राप्त करने हेतु प्रेरित नहि हो सकता है..!
ज्ञान की अनुभूति प्राप्त करके चुप--चाप बात जाना सत्कर्म नही है..!
सभी महान--पुरुषो ने ज्ञान को ह्रदय से जानकार उसका लोकहित में प्रचार--प्रसार किया..!
उनका उद्घोष था...सर्वेभवन्तु सुखिनः..सर्वेसंतु निरामयः..सर्वेभाद्रानी पश्यन्ति..माँ कश्चिदादुखाभाग्भावेत...!!
"जग का भला करो ..अपना भी भला होगा..!!
Tuesday, January 4, 2011
Gyan--Ganga..!!
परमात्मा एक शक्ति[energy] है..!
वह सैट..चित..आनंद..(सच्चिदानन्दमय ) है..!!
सैट ( सत्य ) उनका रूप..चित *चेतना ) उनकी प्रकृति और आनंद ( शाश्वत-शांति ) उनका स्वरुप है..!!
सत्य ही प्रकाश है...चेतना ही शक्ति है..आनंद ही शाश्वत--शान्ति है..!!
परमात्मा अर्धनारीश्वर है....शिव और शक्ति..जड़ और चेतन का संगम है..!! जो कभी बदलता नहि वह सनातन तत्त्व ही सत्य है..जो प्रकाश--स्वरुप है..!सत्यार्थप्रकाश..!!
गीता में श्रीकृष्ण भाफवन कहते है....
ना तद्भाशायातो सूर्यो ना शाशानको ना पावकः..तद्गात्वा ना निवर्तन्ते तद्धाम परमम् ममः..!!
यही बिबले में divine light है..रामचरितमानस में परम--प्रकाश है..कुरान में नूर-ए-इलाही है..गुरुग्रंथ में चांदना है..!! यही सवितादेव का भर्ग (ज्योति) है..!!
चाटना ही शक्ति है..यही..गायत्री--महाप्राण है..यही कुण्डलिनी है..यही निरंजन--माला है..!!
शक्ति अजन्मा..सनातन..शाश्वत..चिन्मय और अविनाशी है..!
यह सर्व--व्यापक..सर्व--शक्तिमान सर्व--कल्याणकारी है..!!
Energy can niether be created..nor it can be destroyed..!!
मानव जीवन को चलने वाली यही परा--शक्ति है..जो स्वान्शो में समाई हुयी है..!!
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता...नमस्ताये..नमस्ताये..नमस्ताये..नमोनमः..!!
शाश्वत--आनंद (BLISS) ही परमात्मा का स्वरुप है..!
ब्रह्माण्ड के कण--कण में आनंद ओत--प्रोत है..
मानव--शारीर ही आनंद का घर है..यही रामायण (राम का घर ) है..!
यह सभी तत्त्व मानव के अन्दर विद्द्यमान है..!!
इसलिए यदि परमात्मा को पाना है..तो सबसे पहले अपने--आपको प्राप्त करना..जानना चाहिए..!!
अपने--आपको जान लेने से सब कुछ जाना हुआ हो जाता है..!
लेकिन येही सब जानने के लिए ही तत्वदर्शी की शरणागत होना पड़ता है..!!
सोई जानहि जेहि देहि जाने..जानत तुम्हहि--तुम्हहि होई जाई..!!
इसलिए जो यह जनता है..वही जना सकता है और जनाने के बाद उसको भी अपने जैसा ही बना लेता है..!!
हे मानव..उठो..जागो..और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो..!!
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