MANAV DHARM

MANAV  DHARM

Friday, December 30, 2011

"ध्यान-योग" क्या है..?

"ध्यान-योग" क्या है..?
अपने मन..इन्द्रियों और चर्म चक्षुओ को बंद करके..आत्म-चेतना को "ध्येय-बस्तु' पर केन्द्रित और घनीभूत करते हुए अपनी चेतना से चेतना में स्थित और स्थिर होना ही ध्यान-योग है..!
इस योग की क्रिया-विधि और ध्येय-वास्तु का  ज्ञान तत्वदर्शी-गुरु से प्राप्त होता है..!
निरंतर अभ्यास और साधना से जब साधक अपनी आत्म-चेतना में स्थित और स्थिर हो जता है..तो उसकी चित्त-वृत्ति एक रस हो जाती है..!
सुख-दुःख..हर्ष-विषाद..जय-पराजय..उन्नति-अवनति..राग-द्वेष स्वांश-प्रस्वांश आदि द्वंदों में उसकी प्रकृति सम हो जाती है..!
इसी को "समत्व-योग अथवा "सहज-योग" भी कहते है..!
योग की सहजावस्था को सदगुरु-कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है..!
इस लिए समय के सच्चे सदगुरु की शरणागत होकर अपना कल्याण करना चाहिए..!

Thursday, December 29, 2011

satsang ganga rkdeo: बिंदु--बिंदु से सिन्धु बना है..बिंदु--बिंदु से ये ...

satsang ganga rkdeo: बिंदु--बिंदु से सिन्धु बना है..बिंदु--बिंदु से ये ...: बिंदु--बिंदु से सिन्धु बना है..बिंदु--बिंदु से ये बादल... बिंदु--बिंदु से निर्झर झरता..बहता सर--सरिता का जल....!!! **गौर करने की बात है..आ...

बिंदु--बिंदु से सिन्धु बना है..बिंदु--बिंदु से ये बादल...

बिंदु--बिंदु से सिन्धु बना है..बिंदु--बिंदु से ये बादल...
बिंदु--बिंदु से निर्झर झरता..बहता सर--सरिता का जल....!!!
**गौर करने की बात है..आखिर यह बिंदु (. )  क्या है ...!
यह (.) ही अक्षर-ब्रह्म है..!
जो कभी क्षरित नहीं होता..सदैव अक्षुन्य..अजन्मा और अनंत है..एकरस है..निर्लिप्त-निराकार-निरंजन-निर्मम-निर्मोही-निर्विकल्प..है..वही.."अक्षर" है..एकाक्षर है..एकरस है..!
जैसे एक क्षुद्र बीज में विशाल वृक्ष समाया हुआ है..वैसे ही..इस विन्दु (.) में..सर्व-शक्तिमान-सर्वज्ञ-सनातन तत्व समाया हुआ है..!
यहि बीज-रूप--विन्दु-रूप परमात्मा ..बर्गो-ज्योति के रूप में.. हर मनाव के ह्रदय में स्थित है..!
यह सिर्फ ध्यान-योग से ही प्रकट..विक्सित और व्यापक होते है..!
ध्यान करने की विधि-क्रिया योग..तत्वदर्शी गुरु से ही सुलभ होती है..!
ध्यान भृकुटी  के मध्य ..आज्ञा--चक्र से होता है..जो मानव शरीर का पवित्रतम..अक्षत..स्थान है..!
ध्यान०योग से मन-इन्द्रियों और शरीर का अतिक्रमण करते हुए..जो भक्त इन्रियातीत परमात्मा को प्राप्त कर लेता है..उसका जीवन धन्य हो जाता है..!!!!
यहि मानव शरीर..जीवन और कर्म की महिमा है..! !

Tuesday, December 27, 2011

अनंत में जितना भी जोड़ा या घटाया जाय..वह अनंत ही रहता है..!

अनंत में जितना भी जोड़ा या घटाया जाय..वह अनंत ही रहता है..!
जैसे महासागर का जल एक घड़े के बराबर पानी निकाल लेने से कम नहीं हो जाता .और महासागर का अथाह स्वरूप अक्षुन्य रहता है.. .वैसे ही...सच्चिदानंद-घन ..आनंद-स्वरूप परमात्मा ..अनंत--अनादि--अचिन्त्य-अद्भुत-आत्म-भू..अखिलेश....सदैव--सर्वदा एकरस और अप्रतिम ..सर्वत्र-समान रूप में विद्यमान है..!!!
ऐसा कोई समय..स्थान..नहीं है..जहां वह व्यापक न हो..!
वह केवल च्निन्तन और अनुभव में आने वाले है..उनका साक्षात्कार केवल अन्तः करना में होता है..
वन चर्म०चक्शुओ का विषय नहीं है..सिर्फ दिव्य नेत्र से ही सच्चे साधक-भक्त उनका दीदार कर सकते है..!
दिव्य-नेत्र की प्राप्ति समय के तत्वदर्शी-गुरु से होती है..!
यही जीवन का ध्येय है कि..सच्चे तत्वदर्शी गुरु की खोज करके..सर्वव्यापक..सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अपने अन्तः करना में प्राप्त करके अपना मानव जीवन सफल करे..!!

Wednesday, December 21, 2011

गुरु की महिमा


युगों-युगों से गुरु की महिमा का वर्णन सद्ग्रंथो में सत्पुरुषो द्वारा किया गया है..!
....जो असत्य से सत्य की ओर..अन्धकार से प्रकाश की ओर..मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाते है..
वही सच्चे-तत्वदर्शी गुरु है..!
"सत्य" क्या है..?
जो कभी परिवर्तित नहीं होता..सदैव-सर्वदा-सर्व-काल ने एक रस..सनातन रहता है..वही "सत्य" है..!
... "असत्य" क्या है..?
जिसका न कभी कोई अस्तित्व था..न है..और न रहेगा..जो अस्तित्वहीन..स्वप्नवत और अप्रत्यक्ष-परोक्ष-अप्रमाणित-मायामय है..वही "असत्य है..!
"अन्धकार" क्या है..?
प्रकाश का न होना ही अन्धकार है..अन्धकार कोई "वास्तु" नहीं..बल्कि..जो चक्षुओ के बंद करने से अनुभव में आता है..और जहा प्रकाश विद्यमान नहीं रहता ..वही अन्धकार है..!दुसरे शब्दों में.."ज्ञान"(प्रकाश) का न होना ही "अन्धकार"(अज्ञान) है..!
"प्रकाश" क्या है..?
जहा सर्वत्र..सूर्य की प्रखर-ज्योति..चक्षुओ से दी दिखलाई पड़ती है..जहां चन्द्रमा की ज्योति और अग्नि का अस्तित्व है..वही प्रकाश इन चर्म-चक्षुओ से अनुभूत होता है..! दुसरे शब्दों में प्रकाश की अनुभूति ही ज्ञान है..!
"मृत्यु" क्या है..?
इस मंच-भौतिक शरीर से पान-अपान..(श्वांस-प्रश्वांस) की क्रिया का सर्वदा के लिए समापन ही "मृत्यु" है..!
"अमरत्व" क्या है..?
इस मंच-भौतिक शरीर में चाल रही श्वांस-प्रश्वांस की द्वंदात्मक-क्रिया को..तत्वदर्शी-गुरु के सानिध्य में तत्त्व-ज्ञान प्राप्त करके ..जो साधक..अद्वेत की स्थिति में पहुच कर सामान कर लेता है..वह..अपने "प्राणों" के वश में करके..चिरंजीवी हो जाता है..यहि "अमरत्व" की स्थिति है..!
****धन्य है..हम भारतवासी..जहा पर ऐसी तत्त्व साधना सुलभ है..ऐसे तत्वदर्शी सुलभ है..जिनकी कृपा से जीव अमरत्व को प्राप्त हो जाता है..!

Thursday, November 10, 2011

"नाम रूप गुन अकथ कहानी..समुझत सुखद न परत बखानी..!

"नाम रूप गुन अकथ कहानी..समुझत सुखद न परत बखानी..!
कहो कहाँ लगि नाम बडाई..राम न सकहि नाम गुन गाई..!!
****
रान एक तापस तिय तारी..नाम कोटि सत कुमति सुधारी..!!
***इस मायामय  संसार में प्रत्येक वास्तु के साथ..उसका नाम और रूप दोनों लगे रहते है..बिना नाम के किसी वास्तु का रूप जानना कठिन है..वैसे ही..परात्मा का भी एक शाश्वत..सनातन और सदैव-सर्वत्र विद्यमान रहने वाला "नाम" है..! जो इस "नाम को जान लेता है..वह प्रभु के रूप को पहचान लेता है..और प्रभु के रूप के पीछे छिपे हुए उनके "शाश्वत-स्वरूप" का भी तत्वतः-वोध प्राप्त कर लेता है..और इस प्रकार वह "प्रभुजी" का ही हो जाता है..!
यह "नाम और "roop " का गुण एक अकथ कहानी है..जिसका वर्णन  नहीं हो सकता..यह केवल समझाने में ही सुखद है..अर्थात यह केवल अनुभूति का विषय है..!
इस "नाम" की महिमा का कहाँ तक वर्णन किया जाय..स्वमेव भगवान् श्री रामचन्द्रजी इसका गुण-गान नहीं कर सके..!!
भगवान श्री रामचन्द्रजी ने तो केवल एक गौतम-ऋषि की पत्नी अहिल्या का ही अपने चरण-राज से उद्वार किया था..जबकि परात्मा के पावन "नाम" को जान कर सहस्रों लोगो की कुमति सुधर गयी..!
***
विचार करने की बात है..परमात्मा का वक् कौन सा नाम है..जो सदैव विद्यमान रहता है..?
वह एक "स्पंदन" है..जो न तो जन्मता है और न ही मरता है..अपितु वह सभी के जन्म और मरण का काराण है..!

तभी तो कहा गया है कि....
"कलियुग केवल नाम अधारा..सुमिरि सुमिरि नर उतरहि पारा..!
नहि कली कर्म न भगति विवेकू..राम नाम अवलंबन एकू..!!
***अर्थात.इस घोर .कलुय्ग में केवल परमात्मा के नाम का ही एक मात्र सहारा है..जिसका सुमिरण करते-करते मानव भव सागर से पाँव हो जाता है..  यह "नाम" ही एक मात्र अवलम्ब है..!यह नाम केवल मानव ही जान सकता है..और इसका उदघाटन समय के तत्वदर्शी महान-पुरुष  द्वारा..एक सच्चे जिज्ञासु के ह्रदय में कराया जाता है..!
इस लिए अपना कल्याण चाहने वाले मानव को समय के  तत्त्व दर्शी महान पुरुष की खोज करके निर्मल और समर्पण भाव से इस नाम का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए...!

Wednesday, November 2, 2011

***"मानवता" ही सच्चा धर्म है...!!

हर इंसान को ओअनी जीवन-ज्योति  से अगाध-प्रेम होता है..!
यह "ज्योति" ही "प्रेम' है..!
यह:प्रेम" ही जीवन को प्रकाशित करता है..!
जहां "प्रेम" है..वहां "जीवन" है..
जहां "घृणा" है..वहां "विनाश" है.."अनर्थ" है.."विद्वेष" है.."कलुषता" है.........
इसलिए हे मानव...उठो.!.जागो..! प्रेम की मशाल लेकर सुशुप्त-जीवात्माओ को जागृत करो..!
यह "जागृति" ही..यथार्थ-जीवन है..!
***इसलिए..जहां प्रेम है..वहा जागृति है..जहां जागृति है..वहां जीवन है...जहां जीवन है..वहां मानवता है........!!!
***"मानवता" ही सच्चा धर्म है...!!

Monday, October 24, 2011

......Spirituality is commonly known as the "Study of Soul"..

......Spirituality is commonly known as the "Study of Soul"..The word "Spirituality" can be divided into two words... spirit + uality. "Spirit" generally means "non-physical life force or entity".whereas  "-uality" means "referring to" or "related to". Thus the word "Spirituality" stands for something ..abstract ..related to spirit or S O U L..( Subject of universal life ) ..its characteristic qualities.  overwhelm an ultimate or an immaterial reality  beyond non-physical beings, including a supreme being. The primary components of spirit,  as a life entity at the human level are will and consciousness. Spirituality can also refer to what are usually considered the more noble qualities of humanistic philosophies, such as integrity, kindness..courage, love and compassion.
Spirituality; an inner path as refers to a person's efforts to discover the essence of his/her natural-being or nature; or to the “deepest values..divine manifestations  and  natural-instincts by which people live...work and behave..!” Spiritual practices, including meditation,..concentration.. prayer ..discourse and contemplation, are intended  wholly to develop an individual's inner life; spiritual experience ..realization and upliftment include that of  connectivity with a subtle ..concrete and abstract reality, yielding a more comprehensively conscious  self;  either with other individuals or the human community; with nature or the cosmos; or with the divine realm. Spirituality is often experienced as a source of divine inspiration or orientation in life. It can encompass belief in immaterialistic- realities or experiences of the immanent or transcendential  nature of the world.

Wednesday, October 19, 2011

***सत्य के समान कोई तप नहीं है

"सांच बराबर तप नहीं..झूठ बराबर पाप..!
जाके हिरदै सांच है..ताके हिरदै आप...!!
***सत्य के समान कोई तप नहीं है..और झूठ के समान कोई पाप नहीं है..!
जिस मानव के ह्रदय में "सत्य" है..उसके अन्दर साक्षात "सत्य-नारायण" विराजमान  है..!
** सत्य ही परमात्मा है..परमात्मा ही सत्य है..!
वही..सत है..चित है..आनन्द है.."सच्चिदानंद" है..!
जिस मानव ने इन्हें तत्त्व से जान लिया..अनुभव कर लिया..वह सदा-सर्वदा के लिए "तद्रूप" हो गया.."तथागत" हो गया..!
**इसलिए हर मानव के जीवन का यह ध्येय होना चाहिए..कि वह अपने अद्नर विद्यमान सत्य को तत्त्व रूप में जानकर  उसकी तात्विक-साधना-पारायण करे..!

Tuesday, October 11, 2011

Brahm ko janane vala hi Brahman hai..!

"ब्राह्मण" वही है..जो "ब्रह्म" को तत्वतः जनता है..
जो "ब्रह्म" की तत्वतः-अनुभूति प्राप्त कर लेता है..वह अपने "प्रभामंडल" में स्थित हो जाता है..!
वह मानव से "महामानव "हो जाता है..!
जिसने ब्रह्म की अनुभूति नहीं प्राप्त किया..उसने अपने  इस मानव-जीवन को व्यर्थ किया..!
धन्य है..वह जीवन..वह कुल..वह माता-पिता वह गुरुश्रेष्ठ ..जिसकी अविरल कृपा से " तथागत "की यह स्थिति प्राप्त होती है..!

Thursday, September 29, 2011

मानव जीवन की सार्थकता

मानव जीवन की सार्थकता इसी में है..कि ..हम अपने सत्कर्मो से इहलोक और परलोक दोनों को संवार  ले..!
यह भौतिक जगत  में ज्ञान-रथ पर आरूढ़ होकर निर्लिप्त-भाव से सारे मानवोचित कर्मो को करते हुए संसार-सागर में तरते रहना और नततः इस पञ्च-भौतिक शरीर में समाई हुयी चेतना-शक्ति से परम-चैतन्यता की स्थिति में चैतन्य-महाप्रभु ..परम-पिता-परमेश्वर में लीन हो जाना ही  मानव-जीवन का परम-ध्येय है..!!

Tuesday, September 27, 2011

Human life is a great gift of Almighty..!

Human life is a great gift of Almighty..!
It is up to the human  being..either to make this life a  "thing of joy for ever " or to stick to exploiting it for this or that reason..!
Essentially LIFE has a reason ..to know..explore..seek..and attain.." Who am I ? "
This can be possible only when..we are onset to get first hand information about aour "spiritual-self".!
We know only one aspect of our existence..that is..The physical appearance and shape..!
Behind this physical curtain..our subtle shape is veiled..wherein dwells a deep ocean of eternal pleasure and peace..!
We can not view this subtle shape through our mortal eyes..!
There is a subtle or divine eye already inherent in our human body..!
It is the Spiritual master or Guru..who dissects this subtle eye and ikkuminates the dormant conscience of the person ..!
Human mind..while it wanders extrovert..is the root cause of our dualistic nature ..attitudes and activities..and when it is diverted entrover..it becomes unitary..sustainable and subtle..!
There is a practical way to get through the evolution of the spiritual-self..!
It is known as Spiritual-knowledge or "Atm-Gyan ".!
This is revealed by the living spiritual master ..!
The only way to fetch a spiritual master is constant and regular satsang..in the nearness of saintly person and enlightened personalities..!
Once such nearness is availed and enjoyed regularly with devotion and dedication..the search for a GURU will be in easy reach..!

Great are those who prosper in spiritual knowledge..!
Long Live Spirituality and spiritual master of the era..!






Bhagvad Gita..chapter-9..shlok..4..5..6..
 Lord shrikrishna..explains about HIS all-pervading existence to Arjun..>>
He says to Arjun.."This world is undoubtably manifested and sustained into ME ..unexplicitelt alongwith  overall mortal elements..but I am not sustaiined into it.. Just look my influence..that..MY ATMA..which fenerates  all-mortal-elements..does not exist into ME..! Just all-pervading air..while it sustains in the sky..moves everywhere..likewise..MY Atma has enveloped the whole mortal elements and beings..!"

Substaintially enough..Almighty..the GOD..is omni-present..and hence He dwells into aour ATMA..!HE is the prime cause of our birth and death..! One..who adores HIM alongwith his Atma..and offers his whole life to HIM..He is saved..! this happens only when the descipline dedicates himself with perfect devotion by virtue of self-transcendance..and the equillibrium of BREATH..!..Otherwise it is futile to  offer adoration  without devotion..!
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Wednesday, September 14, 2011

"अष्टांग-योग"

"अष्टांग-योग" की सफल-साधना से ही साधक के जीवन में "समाधि" घटित होती है..!
वह कुल धन्य है..वह माता-पिता धन्य है..वह जीवन धन्य है..वह गुरु धन्य है..वह घर धन्य है..जहां पार
ऐसे "साधक' ..अपनी साधना में सदैव-तत्पर रहते है ...!!

Thursday, August 18, 2011

God is omni-present

God is omni-present..just like Great-Air..sustained in the sky..moves without interrut\ption everywhere..likewise..God dwells in whole mortal-elements and human -beings..! HIS apparant-realization is a matter of Spiritual-upliftment..! when the aspirant attains equillibrium of breath and get sustained into it..the realization emerges like a sweet-delight known as BLISS..!!

Monday, July 11, 2011

तुलसी जग में आई के कर लीजे दो काम..!

"तुलसी जग में आई के कर लीजे दो काम..!
देने को टुकड़ा भला लेने को हरि नाम..!!"
***भव स्पष्ट है..इस संसार में मानव-तन पाकर दो काम अवश्य ही कर लेना चाहिए..!
पहला तो एक हाथ से दान अर्पण और दूसरा तो..दुसरे हाथ से ज्ञान-ग्रहण..!
इन दो हाथो की उपयोगिता..लेने और देने में ही है..!
जैसे जब हम कोई बस्तु बाजार से खरीदते है..तो पहले उसका मूल्य चुकाते है..तभी वह बस्तु हमें मिलती है..ऐसे ही..आध्यात्मिक दृष्टि से...जब तक हम..गुरु-दक्षिणा में अपने-आप्नको..अपने मन को..श्रीगुरुदेव महाराज जी के चरणों में अर्पित मही
करेगे..तब तक हमें कल्याणकारी-ज्ञान सुलभ नहीं हो सकता है..!
कबीर साहेब कहते है...
"मन दिया सो तिन्ह दिया..मन के लार शरीर..!
अब देवे को कछु है नहीं कह गए दास कबीर..!!
मन के हारे हार है..मन के जीते जीत..!
कगे कबीर हरि पाईये..मन ही के परतीत..!!"
जिसने अपने मन को श्री सदगुरुदेव जी के श्री चरणों में अर्पित कर दिया..उसने सर्वस्व दान कर दिया..उसके पास देने को कुछ भी शेष नहीं राहा..!
कबीर साहेब कहते है..मन के हारने से हार है..और मन के जिताने से जीत है प्रभु जी को पाना है तो..मन (चेतना) की अनुभूति में ही प्रभु को प्राप्त करो..!
***इसीलिए संतो ने कहा...' मनैव मनुष्याणाम..करणं बंध मोक्षयो..."
यह मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है..!
बहिर्मुखी होकर हम बंध जाते है..और जब हम अंतर्मुखी हो जाते है..तब हमारे कल्याण के दरवाजे खुल जाते है..!
इसलिए मन को श्री गुरुदेव जी के श्री चरणों में अर्पित करके हमें अपना कल्याण करना चाहिए....!

Friday, June 17, 2011

जीवन को सम्पूर्णता में जीना है तो ..अपने-आप को जानो..!

जीवन को सम्पूर्णता में जीना है तो ..अपने-आप को जानो..!
"...मै कौन हूँ...?"
क्या मै..केवल मात्र एक स्थूल-पिंड हूँ..?
नहीं..नहीं..मै अपने-आप में ब्रह्माण्ड हूँ..!!
कैसे..??
जैसे अपने स्थूल-नेत्रों से हम घूम-घूम कर सारा भूमंडल देख लेते है..किन्तु अपने चहरे को देख नहीं सकते बल्कि..यत्न-पूर्वक एक दर्पण का सहारा लेते है..वैसे ही अपने अन्दर छिपे हुए ब्रह्माण्ड को सिखाने के लिए हमें गुरु रूपी दर्पण की जरुरत है..!
इसीलिए कहा गया..को पिंड में है वह ब्रह्माण्ड में है...और जो ब्रह्माण्ड में है वह पिंड में है..!
एक को हम स्थूल नेत्रों से देखते है..दुसरे को हम दिव्य-नेत्र से देखते है..!
स्थूल-पिंड नश्वर है..दिव्य-ब्रह्माण्ड नित्य है सनातन है शाश्वत है..!
एक लौकिक है..दूसरा पारलौकिक है..!
इस प्रकार इस मानव-देह के दो पहलू है..एक भौतिक(अपरा)..दूसरा शाश्वत(परा_)..!
एक को हम जानते है..इसी के साथ जीते-मरते है ..
दुसरे को हम नहीं जानते ..और जानना भी नहीं चाहते..??
यही मानव का दुर्भाग्य है..वह नाशवान..अनित्य के पीछे दौड़ रहा है..जो शाश्वत-सनातन है..और थोड़े से सत्प्रयास से हासिल हो सकता है..उसको हम जानना और पाना नहीं चाहते..!
जैसे ही हमें यह शाश्वत लोक अपने भीतर मिल जायेगा..हमारी शारी उद्ग्निता..शोक..क्लेश और विपन्नता..सदा-सर्वदा के लिए समाप्त हो जाएगी..!
आईये...हम अपने आप को जाने.."हम..पिंड ही नहीं..अपितु ब्रह्माण्ड भी है.."...!!

Wednesday, June 15, 2011

मानव जीवन की सम्पूर्णता..!

मानव जीवन की सम्पूर्णता..!
रामचरित मानस में संत-शिरोमणि तुलसीदासजी कहते है....
"नर तन सम नहीं कवनेहु देही..जीव चराचर जचत जेही..!
सरग नरक नसैनी नसैनी..ज्ञान विराग भक्ति सुख देनी..!
अर्थात..मनुष्य के शरीर के समान दूसरा कोई शरीर नहीं है..इस शरीर की याचना चराचर जीव करते रहते है..क्योकि..यह शरीर ही स्वर्ग..नरक और मोक्ष की सिद्दी है..और इस शरीर में ज्ञान..वैराग्य और भक्ति क सुख निहित है..!
****
स्पष्ट है..ऐसे अनमोल मानव-शरीर को प्राप्त करके भी आज क मानव ज्ञान..वैराग्य और भक्ति के सुख से बंचित है..!
भगवान श्रीरामचंद्रजी कहते है...
"बड़े भाग मानुस तन पावा..सुर दुर्लभ सद ग्रंथन्ही गावा..!
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा..पाई न जेहि परलोक सवारा..!
अर्थात..मनुष्य क शरीर बड़े भाग्य से मिलता है..यह देवताओं को भी दुलभ है..! यह साधन (तत्व-साधना) क घर है..ऐसा कौन मनुष्य है..जो इस दुर्लभ शरीर को पा कर भी अपना परलोक नहीं सवारना चाहता..??
***
इस पञ्च-भौतिक और त्रिगुणात्मक मानव शरीर में मन रूपी तंत्र ही बंधन और मोक्ष क कारण है..!
मन के बेलगाम घोड़े को नियंत्रित करने के लिए "अंकुश" की आवश्यकता है..!
मन जब तक बहिर्मुखी रहता है..मानव-शरीर के विभिन्न द्वार खुले रहते है.और विषय-भोग अन्दर प्रवेश करते रहते है..!
जैसे ही यत्न-पूर्वक मन को अंतर्मुखी बनाने क साधन सदगुरु की कृपा से प्राप्त हो जाता है..तो एकाग्रता की स्थिति में बिखरी हुयी चेतना सिमटने लगती है..और इस चेतना की शक्ति से हम चेतना को ही देखने और अनुभव करने लगते है..!
हमें तब यह पता चलता है..की हम हाड-मांस के पुतले मात्र ही नहीं बल्कि एक स्वयं-संपूर्ण आत्मा है..!
यह आत्मा ही परमात्मा क अंश है जो..अपनी स्वाभाविक प्रकृति वश उर्ध्व मुखी होकर अपने अंशी (परम-तत्वम-परमात्मा ) से मिलना चाहती है..किन्तु मानव की बहिर्मुखी प्रवृत्ति इसे अधो मुखी बनाये रहती है..!
अंश (आत्मा) का अंशी (परमात्मा) से मिलना ही जीवन की सम्पूर्णता है..!
यह तभी संभव है..जब की इस भौतिक शरीर से परे इसमे अन्तर्निहित आध्यात्मिक शरीर को हम समय के तत्वदर्शी गुरु से जानकर अष्टांग-योग के साधन द्वारा अपनी चेतना को अंतर्मुखी करके हम चेतना में ही स्थित हो जय.!
जैसे गंगा जी गंगोत्री हिमनद से निकल कर अपनी लम्बी यात्रा पूरी करके अनत में गंगा सागर में मिल जाती है..तो गंगा-जल का सारा कोलाहल समाप्त होहक वहां गंगाजी का नामोनिशान मिट जाता है..और वहां केवल सागर का जल ही जल दृष्टिगोचर होता है..वैसे ही जब एक साधक अपनी आत्मा से साधना की प्रखरता में पहुँच कर जब परम-तत्वतम परमात्मा में लीन हो जाता है..तो उसकी शारी उद्विग्नत..अशांति..सदा-सर्वदा के लिए मिट जाती है..!
*******ॐ श्री सदगुरु चरण कमलेभ्यो नमः....!!!!

Thursday, June 9, 2011

तत्त्व-ज्ञान से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है..!

तत्त्व-ज्ञान से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है..!
अनुभव से बड़ा कोई शिक्षक नहीं है..!
अनुभूति से बड़ी कोई विद्या नहीं है..!
प्रभु-भक्ति से बड़ी कोई साधना नहीं है..!
स्वाध्याय से बड़ा कोई विद्यालय नहीं है..!
इंसानियत से नाडा कोई धर्म नहीं है..!
ईष्या से बड़ा कोई वैरी नहीं है..!
पाखण्ड से बड़ा कोई छल नहीं है..!
गुरु-भक्ति से बड़ी कोई सेवा नहीं है..!
धूर्तता से बड़ा कोई अपराध नहीं है..!
जीव-हत्या से बड़ा कोई पाप नहीं है..!
निराशा से बड़ा कोई विषाद नहीं है..!
आत्म-साक्षात्कार से बड़ी कोई सफलता नहीं है..!
प्रभु-दर्शन से बड़ी कोई उपलब्धि (लाभ) नहीं है..!
दरिद्रता से बड़ा कोई दुःख नहीं है..!
संत-मिलन से बड़ी कोई संतुष्टि नहीं है..!
इमानदारी से बड़ी कोई नीति नहीं है..!
मृत्यु से बड़ा कोई वियोग नहीं है..!
जन्म से बड़ा कोई संयोग नहीं है...!
परमार्थ से बड़ा कोई यश नहीं है..!
स्वार्थ से बड़ा कोई अपयश नहीं है..!
नाम-सुमिरण से बड़ी कोई सम्पन्नता नहीं है..!
अज्ञान से बड़ी कोई दीनता नहीं है..!
ज्ञान से बड़ी कोई सम्पन्नता नहीं है..!
*****सब कुछ ..है..फिर भी कुछ नहीं है..ऐसा भाव रखने वाले मानव अपने जीवन में सदैव शांत और संतुष्ट रहते है..!







Wednesday, June 8, 2011

"नर सहस्र मंह सुनहु पुरारी..कोई एक होइ धर्म व्रत धारी..!

राम चरित मानस में संत-शिरोमणि तुलसीदासजी..शिव-पारवती संबाद में कहते है ...कि मां पारवती शिव जी से कहती है..
"नर सहस्र मंह सुनहु पुरारी..कोई एक होइ धर्म व्रत धारी..!
धर्मशील कोटिक मंह कोई..विषय बिमुख विराग रत होइ..!
कोटि विरक्त मध्य श्रुति कहहि..सम्यक ज्ञान सकुल कोऊ लहही..!
ज्ञानवंत कोटिक मंह कोऊ..जीवन मुक्त सकुल कग सोऊ..!
तिन्ह सहस्र महु सब सुख खानी..दुर्लभ ब्रह्म लीन विज्ञानी..!
धर्मशील विरक्त अरु ज्ञानी..जीवन मुक्त ब्रह्मपर प्रानी..!
सब ते सो दुर्लभ सुर राया..राम भगति रत गत मद माया..!
*****आशय अत्यंत स्पष्ट है...
करोडो मनुष्यों में कोई एक धर्म-व्रत-धारी होता है..!
ऐसे करोडो धर्मशील मनुष्यों में कोई एक विरक्त-वैराग्यवान होता है..!
ऐसे करोडो विरक्त-वैरागी-पुरुषो में कोई एक सम्यक-ज्ञान-दृष्टि वाला होता है..!
ऐसे करोडो ज्ञानवंत मनुष्यों में कोई एक जीवनमुक्त -योगी-पुरुष संसार में मिलाता है..!
ऐसे करोडो जीवन मुक्त पुरुषो में कोई एक विरला और दुर्लभ ब्रह्मलीन -विज्ञानी-पुरुष होता है..!
इन समस्त धर्मशील..विरक्त..ज्ञानी..जीवनमुक्त औत ब्रह्मलीन पुरुषो में कोई एक सबमे अति दुर्लभ मनुष्य जो होता है..वह हे देवाधिदेव-शंकर भगवान..सुनिए..वह सभी माया-मोह से परे रहते हुए प्रभु श्री रामचन्द्रजी की भक्ति करने वाला है...!
*****
तात्पर्य यह है कि....जो परम-प्रभु-परमेश्वर को तत्त्व से जानकर उन की निर्मल-भक्ति करने वाला पुरुष है..वह..अत्यंत दुर्लभ है..!
***जय देव जय जय सदगुरुदेव ..जय देव.....!!!!

"संतोष" से बड़ा कोई धन नहीं है..!

"संतोष" से बड़ा कोई धन नहीं है..!
"आत्म-विश्वास " से बड़ी कोई पूंजी नहीं है..!
"दृढ-निश्चय" से बड़ा कोई बल नहीं है..!
"दूर-दृष्टि" से बड़ा कोई विवेक नहीं है..!
"समर्पण" से बड़ा कोई सुख नहीं है..!
"क्षमा" से बड़ी कोई शीलता नहीं है..!
"करुना" से बड़ा कोई त्याग नहीं है..!
"दयालुता" से बड़ा कोई प्रेम नहीं है..!
"सत्संग" से बड़ी कोई पूजा नहीं है..!
"गुरु-सेवा" से बड़ा कोई सत्कर्म नहीं है..!
"अनन्य-भक्ति" से बड़ा कोई समर्पण नहीं है..!
"सत्य" से नाडा कोई ताप नहीं है..!
"असत्य" से बड़ा कोई पाप नहीं है..!
:परोपकार" से बड़ा कोई धर्म नहीं है..!
"पर-पीड़ा" से बड़ा कोई अधर्म नहीं है..!
"आसक्ति" से बड़ा कोई बंधन नहीं है..!
"सदगति" से बड़ा कोई ध्येय नहीं है..!
"तद्रूपता" से बड़ी कोई मुक्ति नहीं है..!
"अहंकार" से बड़ा कोई शत्रु नहीं है..!
"क्रोध" से बड़ा कोई अज्ञान नहीं है..!
"छिद्रान्वेषण" से बड़ा कोई दुर्गुण नहीं है..!
"विद्या" से बड़ा कोई गुण नहीं है..!
"सात्विकता" से बड़ा कोई मार्ग नहीं है..!
"ध्यान" से बड़ी कोई उपासना नहीं है..!
"अजपा-जप" से बड़ा कोई याग्न नहीं है..!
"पर-निंदा" से बड़ी कोई बुराई नहीं है..!
"समाधि" से बड़ा कोई पुरुषार्थ नहीं है.....!!!
******जिंदगी की डगर पर ढेर सारे गुण-दोष मिलते है...! गुण यही है..कि इन सबके प्रति निरपेक्ष भव रखते हुए अपना रास्ता तय करते चले...!


Tuesday, May 31, 2011

Every human being is born with a pre-calculated span of life..!

Every human being is born with a pre-calculated span of life..!

The more we sleep..the more we lose..!

The less we sleep..the more we yield..!

In the state of a deep-slumber..the breath gets exhausted..fast..!

While running swiftly..it gets wxhausted even faster..!

While we meditate..constantly..it gets saved--!

Its conseration is synonymous to the increase in life-span..!

....So dear my friends..!..Try to save this precious treasure in order to attain the equillibrium..!

Once..the equillibrium is established..perpetual-peace starts dwelling in your life..!

*****What is "equillibrium"..?

We ...the human beings are born-conscious..!

As a natural instinct..every human enjoys triple satates..of..his conscience..!

First state is.."Wide-awake"..!

Second state is "Dreaming-state"..!

Third state is.."Deep-slumber"..!

***All these states are enjoyed by each and every human being ..but there happens a Fourth-satae of human-conscience..!

This is called the state of "Supreme-consciousness"..!

In this state ..a human becomes perfectly conscious of his own consciousness..!

This is attained through constant-spiritual-meditation and individual devotion mixed with total dedication to a living spiritual master ..!

It is the Practical knowledge of the Absolute..which is revealed in the heart of the aspirant by the spiritual master..!

The aspirant gets fully inspired in Divinity..and while meditating on the well-identified point..the aspirant gets fully absorbed into the "Self".! While he transcends the "SElf"..his "spirit" attains LIBERATION..by virtue of self-transcendance..!

Such state happens only when the aspirant is blessed ..!

Thus the Meditation..Meditator and Meditee..becomes perfectly unified..!

This is the state if Equillibrium..whereby ..the person becomes conscious of his own consciousness..!

Great are those..who are blessed ..to attain such state of "supreme-consciousness"...!

***

Every human is born with an inherent potential to concentrate his conscience..!

But..because of the dualities of world and life..only a very selected few ..reach to this juncture..!

Only locky souls are blessed to follow this Path..!

Monday, May 30, 2011

परम-प्रभु-परमेश्वर का तत्व-ज्ञान...!

परम-प्रभु-परमेश्वर का तत्व-ज्ञान...!
==========================
भगवद गीता..अध्याय-७..श्लोक..१..२.,.३..में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है..
"हे पार्थ..!मेरे में असक्त हुए मन से अनन्य भाव से योग में लगा हुआ मुझे सभी कुछ जिस प्रकार संशय रहित जानेगा..सो सुन..! तुझे उस ज्ञान को विज्ञान सहित कहुगा..जिसे जान कर जानने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहेगा..!परन्तु हजारो मनुष्यों में कोई ही योग सिद्ध होता है..और उन सिद्धो में कोई ही मुझे तत्व से जनता है..!"
आगे श्लोक..४..५..६..७..में भगवान कहते है..
"पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश मन बुद्धि और अहंकार ये आठ प्रकार की प्रकृति है..!यह तो अपर है..और परा वह प्रकृति है जिससे हे महावाहो..!यह जीव रूप भुतादी सारा विश्व धरना किया गया है..! ये सब योनी भूत प्राणी आदि सारे जगत का मै उत्पन्न..पालन तथा प्रलय करने वाला हूँ..!हे धनञ्जय मेरे सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है..!यह संपूर्ण जगत धागे में मणियो की बहती मेरे में ही गुथा है..!"
आगे श्लोक...८.९.१०..११.. में भगवान कहते है...
"जल में मै रस हूँ..चन्द्र-सूर्य में प्रकाश हू..संपूर्ण वेदों में प्रणव हूँ..और आकाश में शब्द तथा पृथ्वी में पुरुषत्व हूँ..! पृथ्वी में पुण्य गंध अग्नि में तेज संपूर्ण भूतो में उसका जीवन और तपस्वियों में ताप मै हूँ..!हे पार्थ..! तू सब भूतो का सनातन विज मुझे ही जान..! मै बुद्धिमानो की बुद्धि और तेज वानो का तेज हूँ..!मै बलवानो का सामर्ध्य और धर्मानुकुल सर्व भूतो में काम मै हूँ..!"
आगे श्लोक..१२..१३..१४..१५..में भगवान कहते है....
" और जो भी सात्विक..राजसिक..तामसिक होने वाले भाव है सब मेरे से ही उत्पन्न हुए जान..किन्तु उनमे मै और मेरे में वे नहीं है..!गुणों के कार्य..सत-राज-तम और राग-द्वेष विकार के संपूर्ण विषयो से संसार मोहित है..मुझ अविनाशी को नहीं जनता..! यह त्रिगुण मयो माया बड़ी दुस्तर है..परन्तु जो मुझे निराकार भजते है..वे इस माया से तर जाते है..!माया से हरे हुए ज्ञान वाले अधम मनुष्य ..दूषित कर्म करने वाले मूढ़ मुझे नहीं भजते....!"
****
भगवान श्रीकृष्ण जी ने स्वयं..यह बता दिया है कि...मुझे तत्व से कोई..कोई विरले ही जानते है..!
अपने सर्व-व्यापक स्वरूप और त्रिगुण मई माया के बारे में भी भगवान ने पुरानाता स्प्पष्ट कर दिया है..!
भगवान ने अपनी विभूतियों में विषय में भी यह स्पष्ट कर दिया है..कि जियाने भी ऐश्वर्य वान ..बलवान..तेजवान तपवन ..है उन सबका ऐश्वर्य..बल-सामर्ध्य..तेज और ताप सब कुछ वही है..!
सब ब्जुतो का सनातन विज भगवान ने स्वयं को ही बताया है..!
परमात्मा को केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है..!
तत्व०ग्यन वही पाने का अधिकारी है..जिसकी वृत्ति स्स्त्विक हो और जो योग-निष्ठ होकर कर्म करने वाला हो..!
सब कुछ..अपर और परा दोनों ही प्रकृति परमात्मा में ही समायी हुयी है..!
परमात्मा के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है..!
जो परमात्मा को तत्व से जानकर निरंतर भजन करते है वह इस मायामय संसार से तर जाते है..!
जिनकी चित्त-वृत्तिय माया द्वारा हर ली गयी है वह..अधम..दूषित कर्म करने वाले मनुष्य परमात्मा को कदापि प्राप्त नहीं कर सकते है..!
यह तत्व-ज्ञान समय के तत्वदर्शी गुरु की कृपा से ही योग-सिद्धि के द्वारा भगवद-कृपा से फलीभूत होता है..!
**** जय देव जय सदगुरुदेव..जय देव....!!

Saturday, May 28, 2011

"ज्ञान पंथ कृपान के धारा..परत खगेस होइ नहीं पारा..!

ज्ञान-योग की महिमा का वर्णन करते हुए काकभिशुन्द जी रामचरित मानस में गरुण जी से कहते है....
"ज्ञान पंथ कृपान के धारा..परत खगेस होइ नहीं पारा..!
जो निर्विघ्न पंथ निर्वाहाही..सो कैवल्य परम पद लहही..!
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद..संत पुरान निगन आगम बद..!
राम भजन सोई मुकुति गोसाई..अनइच्छित आवहि वरियाई..!
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई कोटि भाति कोऊ करे उपाई..!
तथा मोक्ष सुख सुनु खगराई..रहि न सकई हरि भगति विहाई..!
अस विचारी हरि भगति सयाने..मुक्ति निरादर भगति लुभाने..!
भगति करत बिनु जातां प्रयासा ..संसृति मूल अविद्या नासा..!
भोजन करिय त्रिपिन हित लागी..जिमि सो आसन पाचवे जठरागी..!
असि हरि भगति सुगम सुखदायी..को अस मूढ़ न जाहि सोहाई..!
सेवक सेव्य भाव बिनु भव न त्रिय उरगारि..भजहु राम पार पंकज अस सिद्धांत विचारि..!
जो चेतन कंह जड़ करई जडाई करहि चेतन्य..अस समर्थ रघुनाथाकाही भजहि जीव ते धन्य..!
*****
इस प्रकार बहुत सुन्दर ढंग से ज्ञान की महिमा और इसके फल के बारे में उपरोक्त चौपाईयो में प्रकाश डाला गया है..!
ज्ञान-मार्ग तलवार की धार की तरह है..जिस पार पैर रख कर कोई पार नहीं हो सकता है..!
जो इस मार्ग पार निर्विघ्न-रूप से चलते है..वह कैवल्य-मोक्ष को प्राप्त करते है..!
यह कैवल्य-पद अति दुर्लभ है..जिसकी वंदना वेद-पुराण-संत लोग करते रहते है..!
प्रभु के भजनसे ही यह मुक्ति मिलाती है..जिसके प्रभाव से अनइच्छित फल सहज में सुलभ हो जाता है..!
जैसे कोटि उपाय करने पर भी बिना थल के जल नहीं रह सकता..वैसे ही बिना मोक्ष के सुख से प्रभु की भक्ति नहीं रह सकती..!
ऐसा विचार करके विवेकी प्रभु-भक्त गण मुक्ति का निरादर करते हुए प्रभु की भक्ति के लिए लालायित रहते है..!
प्रभु की भक्ति करने से बिना प्रयास से ही सृष्टि के मूल में व्याप्त अज्ञान का नाश हो जाता है..!
जैसे तृप्ति के लिए किये गए भोजन के अंश को जठराग्नि पचाती है..वैसे ही प्रभु की भक्ति परम सुखदायक है..और कौन ऐसा मुर्ख है जिसे यह भक्ति न सोहाती हो..?
बिना प्रेम और समर्पण भाव से प्रभु की सेवा करने से कोई भी संसार-सागर से पार नहीं उतर सकता है..!
जो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ करने वाले है..उस सर्व-शक्तिमान-समर्थ परमा=प्रभु परमेश्वर का जो जीव भजन करता है..वह धन्य है..धन्य है...!!
*****
जय देव जय सदगुरुदेव..जय देव.....!!!

Friday, May 27, 2011

शब्द ही धरती..शब्द ही आकाश..शब्द ही शब्द भयो प्रकाश..!

WORD is Earth..WORD is Sky. WORD  and  WORD  is  Light...WORD is the Creation..WORD is the Inhale and Exhale of a human being..!..So..just think for a while..why you are expoiling your life..? Ye know then..it is thy real-might..!
****
शब्द ही धरती..शब्द ही आकाश..शब्द ही शब्द भयो प्रकाश..!
शगली सृष्टि शब्द के पाछे..नानक शबद गटागट आछे..!
***
अजपा नाम गायत्री..योगिनाम मोक्ष दायिनी..!
यस्य संकल्प मात्रेण सर्व प्रापये प्रमोच्याते....!!
***
शबद बिना सूरत अँधेरी..कहो कहाँ को जाए..?
दवार न पावे शबद का फिर-फिर भटका खाए...!!
....सब कुछ परमात्मा के पावन नाम (शबद) में ही समाया हुआ है..!
जो इस नाम को जानता है..वह सर्वज्ञ है..जो इसको नहीं जानता..वह अग्यानान्धाकर में पडा है..!
यह नाम वाणी का विषय नहीं..यह सिर्फ और सिर्फ अनुभूति का विषय है..!
यह ह्रदय में खुद-बी-खुद प्रकट होता है और तुरीय-चेतना इसका अनुभव और श्रवण करती है..!
*** हे मानव ..! उठो..जागो और इस नाम को जानो..!

एक राष्ट्र..एक ध्वज..एक आत्मा..!!!

युग-परिवर्तन के लिए हमें धरती नहीं बदलनी..आसमान नहीं बदलना..नदिया नहीं बदलनी..पहाड़ नहीं बदलने..वृक्ष नहीं बदलने.....बल्कि हमें मानव के मन को.. मानव के विचारों  को..मानव के ह्रदय को..और ..अपने-आप को बदलना है..!
युग-परिवर्तन का केंद्र-विन्दु यह मानव और उसका मन है..!
मानव -मन को बदलने के लिए हमें अपनी बिखरी हुयी शक्तिओ को समेट कर अंतर्मुखी करना होगा.!
यह अध्यात्म के माध्यम से ही संभव है..!
इसलिए अपने-आप को जानने के लिए हमें समय के तत्वदर्शी महान पुरुष की खोज करनी होगी..!
जब तत्वदर्शी गुरु का सानिध्य प्राप्त होगा..तभी आत्म-ज्ञान प्राप्त हो सकता है..!
..और यहि अत्म-ज्ञान  एक ऐसा साधन है..जो मानव को महामानव के रूप में परिवर्तित कर देता है..!
मानव व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख हो जाता है..!
..इसलिए समय की पुकार है..आईये..अपने आप को जानकर अपने को..समाज को..देश को और दुनिया को खुश हाल बनाने का संकल्प ले..!
एक राष्ट्र..एक ध्वज..एक आत्मा..!!!

Tuesday, May 24, 2011

छोरम ग्रंथि पाँव जो सोई..तब यह जीव कृतारथ होइ..!

शिव और  शक्ति  का  संयोग  ही  मानव में  कड़  और  चेतन  रूपी ग्रंथि  का  कारण है ..! 
इस  ग्रंथि  से छूटना  ही जीव  की सदगति  है..!
जब तक "आत्म-ज्ञान" प्राप्त नहीं होता..तब तक..यह गुना-भेद  समझ  में नहीं आ सकता है..!
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते है....
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा..तव भव मूल भेद भ्रम नासा..!
प्रावल अविद्या  कर परिवारा..मोह आदि तम मिटहि अपारा ..!
तब सोई बुद्धि पाई उजियारा..उर गहि बैठि ग्रंथि निरुआरा..!
छोरम ग्रंथि पाँव जो सोई..तब यह जीव कृतारथ होइ..!
अर्थात ..आत्म-अनुभव ही वह सुखद..सुन्दर  प्रकाश है..जिसको प्राप्त करते  ही सारे भय..भेद   और भ्रम का नाश  हो जाता है..और प्रावल-अज्ञान  से उत्पन्न हुए मोह आदि तमो गुण नष्ट हो जाते है..ऐसी स्थिति में सुक्ष्म चेतना की शक्ति और भजन के प्रभाव से जड़-चेतन रूपी ग्रंथि निर्मल होकर छुटने लगाती है..!जैसे  ही यह ग्रंथि  जिस  जीव की छूटती है..वह तत्क्षण- कृतार्थ  हो जाता है..!
यहि आत्म-ज्ञान  और ज्ञानी  की महानता है..!
धन्य है वह तत्वदर्शी-गुरु..जिसकी कृपा से जीव का कल्याण हो जाता है..!
***
ॐ श्री सदगुरु चरण कमलेभ्यो नमः....!

Saturday, May 21, 2011

"उमा कहहु मै अनुभव अपना...सत हरि भजन जगत सब सपना....!"

भगवा सदाशिव रामचरितमानस में पार्वती जी से कहते है..
"उमा कहहु मै अनुभव अपना...सत हरि भजन जगत सब सपना....!"
****
अर्थात..परमात्मा का भजन ही सत्य है..यह संसार स्वप्नवत है..!
जगर अवस्था में स्थूल-नेत्रों से हम जो कुछ भी देखते है..वह सुषुप्ति के अवस्था में गहरी-निद्रा में पहुचने-मात्र से सब कुछ तिरोहित हो जाता है..!
जब तक जीव को ऐसी गहरी-निद्रा प्राप्त नहीं होती..तब तक स्तन-मन का तनाव और तृष्णा शांत नहीं हो पाती..!
दिन और रात्रि के चौवीस घंटो में रात्रि की छ घंटो की निद्रा जब जीव को प्रकृति-वश मिलती है..तब सारे सांसारिक..रिश्ते..धन-दौलत..पद-प्रतिष्ठा..संपदा ..यहाँ तक की मानव का यह शरीर भी गहरी निद्रा में तिरोहित हो जाता है..! जब तक ऐसी मीठी नींद नहीं मिलती..तब तक..न तो एक राजा को और न ही रंक को तन-मन का चैन मिलता है..सब कुछ भूलने से ही यह चैन प्राप्त होता है..!
इसलिए सदाशिव-शंकर भगवान कहते है...यह संसार स्वप्नवत है..!
बहिर्मुखीोकर स्थूल नेत्रों से हम वास्तविकता से परिचित नहीं हो सकते..!
हमें अंतर्मुखी होकर दिव्य-नेत्र से ही चराचर जगत और इसके नियंता परम-प्रभु-परमेश्वर का यथार्थ ज्ञान हो सकता है..!
इसलिए कहा गया है..परमात्मा का भजन ही सत्य है..!
प्रभु जी को उनके सत्य-नाम और रूप-स्वरूप में जानने का सत्प्रयास करना और इसी में तन और मन को तल्लीन करना ही भजन है..!
जहा तन लगता है..वही मन लगता है.और जहां मन लगता है वही धन लगता है .!
इसीलिए ..संत शिरोमणि तुलसीदासजी कहते है...
"श्रुति सिद्धांत यही उरगारी..राम भजो सब काज बिसारी..!"
अर्थात..सब कुछ (तन-मन-धन)अर्पित कर प्रभु का भजन करना ही सभी वेद-शास्त्रों के नीति-वचन है..!
ॐ श्री सद्गुरु चरण कमलेभ्यो नमः....!
Only the adoration of GOD is substantial in this world..!
The world is nothing but a lasting dream..!
 


 

Wednesday, May 11, 2011

योग..योगी..और योगाभ्यास..(क्रमशः)

योग..योगी..और योगाभ्यास..(क्रमशः)
******
गीता..अध्याय..६..श्लोक.३५,,.४६..में भगवान श्रीकृष्ण जी कहते है..
"हे अर्जुन..! निसंदेह यह मन चंचल है..कठिनता से वश में आने वाला है..परन्तु हे कुन्तीपुत्र..यह योगाभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है..!क्योकि मन को वश में न करने से योग की प्राप्ति नहीं होती..ऐसा मै मानत हू..!परन्तु मन को वश में करने का ही तो यह उपाय है की विषय भोगो को त्याग कर मन को शुभ कार्य में लगावे ..यह वैराग्य है..और विषयो का चिंतन न करके ध्यान में मन को लगाना अभ्यास है..!"
अर्जुन के यह पूछने पार कि..श्रद्धा सहित प्रयत्न करने पर भी वश में न होने वाला मन योग में चलायमान हो जय तो योग सिद्धि को प्राप्त न होकर उसकी क्या गति होगी..?
उत्तर में भगवान श्रीकृष्णजी स्श्लोक..४०..४१..में कहते है..
"हे पार्थ..उस पुरुष को न इस लोक में न परलोक में दुर्गति होती है..क्योकि कल्याण में लगा कोई भी ,मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता..!वह प्रयत्न किये गए पुण्यो के फलस्वरूप कुछ समय तक पुन्यवान उत्तम लोको को प्राप्त होका श्रीमान पवित्रत्माओ के घर में जन्म लेता है..!"
आगे श्लोक..४२..४३..४४ ..में भगवान कहते है..
":अथवा..योगी पुरुषो के घर में जाता है..जो कि.इस लोक में दुर्लभ है..!हे कुरुनन्दन..वह पुरुष पहले कि देह में बुद्धि के संयोग से किये गए प्रयत्नों के द्वारा ..पूर्व संसकारो के द्वारा योग सिद्धि को प्रप्त होता है..! वह विषय भोगो में लगा हुआ भी ओउर्व अभ्यास के बल पर शब्द-ब्रह्म के योग अभ्यास में वर्तता है..!"
आगे श्लोक..४५..४६..४७..में भगवान कहते है...
"जब प्रयत्न करने से योगी परमगति को प्राप्त होकर पापो से मुक्त हो जाता है तो..तो अनेक जन्मो में योग सिद्धि को प्राप्त हुआ योगी भी परम गति को पता है..!इसलिए योगी तपस्वियों में श्रेष्ठ है..ज्ञानियों में भी श्रेष्ठ मन गया है..तथा सकाम करने वालो में भी योगी श्रेष्ठ है..!अतः हे अर्जुन..!तू योगी हो..!संपूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी अंतर आत्मा में निरंतर स्मरण करता हुआ मुझ परमेश्वर को भजता है..वह श्रेष्ठ मानी है..!"
****
भव अत्यंत स्पष्ट है..
मन को निरंतर ध्यान में लगाने के लिए यह परमा आवश्यक है कि..मनुष्य लौकिक कामनाओ का त्याग करे..क्योकि यह कामनाये ही मन की चंचलता का प्रमुख कारण है..!
विचार करने कि बात है..कि जब बुरे कर्म करने वाला..फल भोगने के लिए नरक में जाता है..और पुण्य कर्म करने वाला स्वर्ग को जाता है तो....भगवान का भक्त हो कैसे नष्ट हो जायेगा..??
भगवद-भक्त द्वारा किये गए अपने सत्कर्मो का फल पुन्यवान लोको में भोग कर ऐसे घर में जन्मता है..जहां भगवान की भक्ति में ही दिन-रात बीतता हो..एवं सुगमता से भक्ति योग में लगकर भागवत-प्राप्ति स्वरूप परम-शांति पाता है..!
चाहे सन्यासी हो या कर्म योगी..जो संपूर्ण कामनाओ से रहित होकर निष्काम भाव से परमेश्वर को भजता है..वह श्रेष्ठ है..!
***ॐ श्री सदगुरु चरण कमलेभ्यो नमः***

Tuesday, May 10, 2011

योग..योगी और योगाभ्यास..(क्रमशः)..!

योग..योगी और योगाभ्यास..(क्रमशः)..!
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गीता अध्याय-6 श्लोक ..२६..२७..२८ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है..
"परन्तु जिसका मन वश में नहीं हुआ है..वह स्थिर न रहने वाले मन को सांसारिक पदार्थो में रोककर बारम्बार परमात्मा में निरोध करे..!जिसका मन अच्छी प्रकार शांत है..पाप से रहित है..रजोगुण शांत हो गया है..उसे परमात्मा के साथ ब्रह्मानंद की प्राप्ति होती है..!पाप रहित योगी ब्रह्म स्पर्श से अत्यंत सुख भोगता है..!"
आगे श्लोक..२९..३०..३१..३२..में भगवान कहते है..!
"समस्त भुतात्माओ में परमात्मा की स्थिति और परमात्मा में सर्व भूत प्राणियों की जो सब जगह देखता है..वह योगी समान देक्गता है..वह मुझे सर्वत्र और सबको मुझमे देखता है..!उसके लिए मै अदृश्य नहीं होता हू..वह भी मेरी आँखों से दूर नहीं रहता है..!जो योगी मुझे सर्व-भूत-प्राणियो में स्थित जानकर भजता है..वह हमेशा मुझमे ही वर्तता है..!जो अपनी समान दृष्टि से संपूर्ण भूतो में समान देखता है..वह सुख-दुःख को भी समान देखता है वह मेरे मत में श्रेष्ठ है..!"
****
भाव अत्यंत स्पष्त है..
सांसारिक भोगो के कारण जो इस शरीर में आसक्त है और भोगो की तथा अनेको कार्यो की जिसे चिंता है जो नश्वर शरीर के जितना भी अपनी आत्मा को प्रेम नहीं करता..और चाहता है..मन भजन में लगे..तो यह ऐसा ही है मनो..सूर्य और रात्रि एक ही जगह रहे..?? भला यह कैसे संभव हो सकता है..??
परमात्मा के ध्यान में लगाने के लिए तो भोगो की कामना तो त्यागनी ही पड़ेगी..!
मन को विषय भोगो में न लगाकर परमात्मा के ध्यान में लगाना ही होगा..!
सांसारिक कार्यो तथा सेवा से ही मन वश में कैसे होगा..??
****
परमात्मा सर्वत्र-सदैव ही सर्व०भुत-प्राणियों में निवास करते है..इस प्रकार की दृष्टि रखने वाला योगी परमात्मा की आँखों के सामने सदैव रहता है..!
जो योगी सर्व-भूत-प्राणियों में परमात्मा को स्थित मनाकर भजता है..वह हमेशा परमात्मा में वर्तता है..! अपनी समान-दृष्टि से संपूर्ण-भूतो में समान देखने वाला योगी सुख०दुख में समान हो जाता है..!
***ॐ श्री सदगुरु चरण कमलेभ्यो नमः***
 

Sunday, May 8, 2011

"नाम लेट भव सिन्धु सुखाही करहु विचार सुजन मन माही..!!"

संत तुलसीदासजी कहते है...
"राम भालु कपि कटक बटोरी..सेतु हेतु श्रम कीन्ह न थोरी..!.
"नाम लेट भव सिन्धु सुखाही करहु विचार सुजन मन माही..!!"
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचंद्रजी ने अद्भुत नर-लीला करते हुए समुद्र पार सेतु बनाने के लिए भालु-बंदरी की सेना तैयार की और सेतु-निर्माण के लिए बहुत श्रम किया..लेकिन विचार करने की बात है..की..परम-पिता-परमेश्वर का वह कौन सा नाम है जिसके स्मरण मात्र से भी संसार-सागर (दुःख का समुद्र) सुख जाता है..!
यह वही "नाम" है जिसे भगवान सदाशिव-शंकरजी उमा सहित सदैव जपते रहते है..!
"मंगल भवन अमंगल हारी..उमा सहित जेहि जपत पुरारी.."
यह नाम परा-वाणी है..जिसका ज्ञान जिज्ञासु के ह्रदय में समय के तत्वदर्शी-महान-पुरुष द्वारा कराया जाता है..!

गोस्वामी तुलसीदासजी कहते है..
"हित अनहित पसु पच्छिहू जाना..मानुस तन गुन ज्ञान निधाना..!"
अर्थात..पशु-अक्षी भी ओअनी भलाई-बुराई की बात समझते है..मनुष्य का शरीर तो गुणों और ज्ञान का भण्डार है..!
गोस्वामी जी आगे कहते है..
"नत०तन सम नहि कवनेहु देही..जीव चराचर जचत जेही..!
सरग नरक अपवर्ग नसैनी..ज्ञान विराग भक्ति सुख देनी..!!"
अर्थात..मनुष्य के शरीर के सामान और कोई दूसरा शरीर नहीं है..जिसको पाने की लालसा सभी चराचर जीव करते है..!यह शरीर ही स्वर्ग--नरक और मोक्ष की सीढ़ी है जिसमे ज्ञान..वैराग्य और भक्ति का सूझ मिलाता है..!
इसलिए हे मानव..! उठो..जागो..और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो..!

Saturday, May 7, 2011

"आग लगी आकाश ने झड-झड गिरे अंगार..!

"आग लगी आकाश ने झड-झड गिरे अंगार..!
संत न होते जगत में तो जल मरता संसार..!!"
इस पुरु धरती पर प्रेम..शांति..सद्भाव..एकता..बंधुत्व..पारस्परिक-समानता..सामंजस्य..सहिष्णुता..सहभागिता..सहयोग और लोक-कल्याण का सन्देश देने वाला यदि कोई है..तो वह "संत-महान-पुरुष" ही है..!
धरती पर विद्वेष..हिंसा..अराजकता..आतंक..अनैतिकता..भ्रष्टाचार..अस्थिरता..साम्प्रदायिकता स्वार्थलिप्सा और अनेकानेक कुप्रवृत्तियो को उत्पन्न करने और फैलाने के लिए आसुरी प्रकृति वाले इंसानों की कमी नहीं है..आग लगाने में सर्वत्र-सभी को महारत हासिल है..लेकिन बुझाने के लिए कोई--कोई ही सामने आता है..!
मारने वाले से बचाने वाला महान होता है..!
जैसे विजली ले तार में निगेटिव और पोसितिवे दोनों तरह के तार होना जरुरी होता है तभी लाइट जलती है..वैसे ही संसार में अधर्म बढ़ जाने पर ऋणात्मक और घनात्मक..दोनों ही तरह की शक्तिओ का जब संघर्षण होता है..तभी संसार में धर्म की स्थापना के लिए महान-पुरुष अवतरित होते है..!
"जब-जब होइ धरम के हानी..बाढाही असुर अधम अभिमानी..!
तब तब प्रभु धरी मनुज सरीरा..हरही कृपानिधि सज्जन पीरा..!"..(रामचरितमानस)
**परितानाम साधुनाम..विनासाय च दुस्कृताम..धर्म संस्थापने सम्भावानी योगे युगे..! (गीता)
** स्पष्ट है..मनुष्य के रूप में भगवद-अवतार युग-युग में सजानो की पीड़ा के हराना और दुर्जनों के विनाश के लिए होता है..!
ऐसे भगवद-अवतार के रूप में मनुष्य के वेष में महान-पुरुष की पहचान करना बहुत ही कठिन है..जब तक कि वह अपनी पहचान स्वयं ही न करा दे..!
इनकी पहचान स्थूल-दृष्टि से नहीं अपितु ज्ञान-दृष्टि से होती है..!!
जब तक अज्ञान का समूल नाश करने वाला प्रभु के सर्व-व्यापक स्वरूप का ज्ञान समय के तत्वदर्शी गुरु से प्राप्त नहीं होगा..तब तक ज्ञान-दृष्टि नहीं खुल सकती है..!
इसलिए भगवद कृपा से ही सच्चे तत्वदर्शी गुरु की प्राप्ति होती है..जिनसे तत्व-ज्ञान सुलभ होता है..!
आवश्यकता है..तत्वदर्शी गुरु की खोज करने की..जो ज्ञान-दृष्टि देकर भगवद-दर्शन करा सके..!
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ॐ श्री सद्गुरु चरण कमलेभ्यो नमः..!!

Thursday, May 5, 2011

याग..योगी..एवं योगाभ्यास..(क्रमशः)

याग..योगी..एवं योगाभ्यास..(क्रमशः)
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गीता अध्याय..६ श्लोक..१६..१७..१८..१९ में भगवान श्रीकृष्णजी कहते है...
:किन्तु यह योग न तो बहुत खाने वाले को और भूखे रहने वाले को ही सिद्ध होता है ..न जगाने वाले को..न स्वप्न देखने वाले को सिद्ध होता है..! हे अर्जुन..! यह योग तो उचित आहार-विहार तथा उचित कर्म की चेष्टाओ से सिद्ध होता है..!संपूर्ण कामनाओ..चिंताओं से रहित मन चित्तात्मा ध्यान में स्थिर हो जाता है जवाह योग युक्त है..! जिस प्रकार वायु रहित स्थान में दीपक की ज्योति स्थिर रहती है..उसी प्रकार योगी का चित्त भी ध्यान में स्थिर रहता है..!"
आगे श्लोक..२०..२१..२२ में भगवान कहते है...
:"योगी का चित्त जब योग अभ्यास में शांत हो जाता है..और आत्मा की शांति का अनुभव करता है..!इन्द्रियों के विषयो से छूती हुयी बुद्धि परमानन्द का अनुभव कराती है..और भगवत ध्यान से चलायमान नहीं होती..इस परमानन्द से बढ़कर जो दूसरा लाभ नहीं समझता है उसे बहुत बड़ा दुःख भी चलायमान नहीं करता..!"
आगे श्लोक..२३..२४..२५..में भगवन कहते है...
" जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है और योग के साथ है..जो निश्चय करके ध्यान योग में स्थित हकी !ध्यान उसके लिए अनिवार्य है..!उसे चाहिए की संपूर्ण कामनाओ को बासना और आसक्ति सहित मन इन्द्रियों के समुदाय को वश करके लादातर अभ्यास करता हुआ धैर्य युक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा के ध्यान में स्थित करके परमात्मा के सिवाय कुछ भी चिंतन न करे..!"
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भगवान  श्रीकृष्णजी के मुखारविंद से योगाभ्यास के विषय में कही गयी विधि स्वतः स्पष्ट है..!तत्वदर्शी सदगुरुदेव से जो तत्त्व-ज्ञान प्राप्त होता है..उसमे ब्रह्म-ज्योति का ध्यान..शब्द-ब्रह्म का चिंतन मन की एकाग्रता के लिए शब्द-श्रुति का एकता में मन और प्राणों का हवन  करना तथा ज्ञानामृत का पान करना ही ब्रह्मचारी का ब्रहमाचरण है..!
निरंतर सुमिरण प्रत्येक कार्य के प्रारंभ में और अनत में तथा सभी कार्यो को करता हुआ भगवत नाम का ही चिंतन करे दिन-रात..सोते-जागते..उठाते-बैठते..सभी समय में स्मरण करना अत्यंत कल्याणकारी है..!
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ॐ श्री सदगुरु चरण कमलेभ्यो नमः...!!!

Wednesday, May 4, 2011

योग..योगी..एवं योगाभ्यास...!

ॐ श्री सदगुरु चरण कमलेभ्यो नमः....!!
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योग..योगी..एवं  योगाभ्यास...!
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गीता..अध्याय-६ ..श्लोक १..२..३.में भगवन श्रीकृष्णजी कहते है...
"जो कर्म के फल को न चाहता हुआ करने योग्य कर्म करता है..वह सन्यासी है..योगी है..!केवल अग्नि और क्रिया कर्म को त्यागने वाला सन्यासी नहीं है..!जो सन्यासी है..वही योगी है..! हे..पांडव..!जिसका मन वश में नहीं है..वह न योगी है और न सन्यासी ही है..ध्यानयोग में लगे योगी को मन के संकल्पों को त्यागकर निष्काम भव से कर्म करना श्रेष्ठ बताया गया है..!"
आगे श्लोक..४..५..६ में भगवान कहते है...
"योग अभ्यास में लगा हुआ योगी जिस समय इन्द्रियों के विषय भोगो से असक्त नहीं होता..इच्छाओं को त्याग देता है..वह योग अभ्यासी कहा जाता है..!मनुष्य को चाहिए..अपनी आत्मा का उद्धार करे..उसे अधोगति में न ले जाते..!यह आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है..जिसने मन को जित लिया वह अपना मित्र और जिसने इन्द्रियों के विषयो में मन को लगाया..बह अपना ही अपना शत्रु है..!"
आगे श्लोक ..७..८..९ में भगवान कहते है...
"जिसकी जीती हुई आत्मा परमात्मा में शांत है..उसके लिए सर्दी-गर्मी..सुख-दुःख..मान-अपमान तथा जन्म-मरना की वृत्तियाँ सब शांत है..ऐसा ही ज्ञान विज्ञान में तृप्त है..विकार रहित है..इन्द्रियाँ विषयो से जीती हुयी है..और लोहा-मोती जिसके लिए बराबर है..ऐसा योगी ही योग युक्त है..!इसमे भी जो वैरी और मित्र उदासीन या परमार्थी द्वेस्ग या बंधू धर्मात्मा हो या पापी..सबमे सामान भव रखता है ..वह योगी एवं सर्वश्रेष्ठ है..!"
आगे श्लोक..१०..११..१२..में भगवान कहते है...
"संपूर्ण आशाओं को त्याग योगी सदा चित्तात्मा को ध्यान में स्थिर रखे क्योकि शुद्ध भूमि में और प्रतिष्ठित सुन्दर देश में आत्मा की स्थिरता का आसन लगाकर न तो अपनी इच्छाओं को उंचा ले जाय और न नीचा अतः आत्मा रूपी आसन में दबा दे..! ऐसे आसन पर बैठकर मन को ध्यान में एकाग्र करके आत्म-शुद्धि के लिए यग-अभ्यास करे..!"
आगे श्लोक..१३..१४..१५..में भगवान कहते है..
"काय...सर और गले को सीधा रखकर इधर-उधर न देख कर नाक के अदली ओर देखता हुआ आत्मा से ब्रह्म का आचरण करता हुआ विषयो से मन को रोक कर मेरा चिंतन करे ..मन में लगे हुए चित्त को ध्यान में लगाये..! इस प्रकार योगी नित्य परमात्मा के ध्यान में लगा हुआ स्वाधीन मन वाला परमानद..परम शांति पता है..!"
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भगवन श्रीकृष्ण जी के मुखार्वुन्द से निकली हुयी वाणी से ..ध्यान-योग से अपनी आत्मा में स्थित होकर चित्तात्मा का ही आसन लगाकर मन को विषयो से रोक कर परमात्मा का चिंतन करते हुए चित्त को ध्यान में लगाने वाला योगी ही परमानन्द को प्राप्त करता है..!
जिसका मन वश में नहीं है..वह न तो योगी है और न ही सन्यासी ही है..!
सब प्रकार से मन को इन्द्रियों के विषयो से हटाकर अपनी आत्मा से ध्यायोग द्वारा जो निरंतर परमात्मा का चिंतन और ध्यान करता है..वही योगी है..!
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ॐ श्री सद्ग्रुर चरण कमलेभ्यो नमः..!!

Monday, May 2, 2011

एकम सत्यपाल द्वितीयो नास्ति....!!!

वह शक्ति हमें दो हे भगवान..! हम ज्ञान सत्य का पा जाए..!
वह शक्ति हमें दे दो जिससे ..हम एत्य मार्ग से लग जाए..!
हमको अपनी मर्यादा का नित ध्यान रहे..अभिमान रहे..!
चलकर सच्चाई पर अपना हम जीवन सफल बना जाए..हम जीवन सफल बना जाये....!!
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"मानव-धर्म" के प्रणेता..विश्व-शांति..विश्व-वन्धुत्व..प्रेम-एकता-सद्भाव के अग्रदूत....तत्व-ज्ञान के शिखर-महान-पुरुष..गुरुओ के भी गुरु..प्रखर समाज-सेवी..अध्यात्म और विज्ञान के कुशल समन्वयक..समय के तत्वदर्शी महान-पुरुष..इक्कीसवी शताब्दी की दिव्यतम-विव्हुति..सदगुरुदेव श्री सतपाल जी महाराज के श्री-चरणों में शत-शत दंडवत-प्रणाम...!!
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एकम सत्यपाल द्वितीयो नास्ति....!!!

Sunday, May 1, 2011

भक्ति की महिमा...!

ॐ श्री सद्गुरु चरण कमलेभ्यो नमः...!
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भक्ति की महिमा...!
रामचरितमानस में ग्स्वमी तुलसीदासजी कहते है..
भगतिहि सानुकूल रघुराया..ताते तेहि डरपति अति माया..१
राम भगति निरुपम निरुपधि..नसाहि जासु उर सदा अवाधी..!
तेहि विलोकी माया सकुचाही..करि न सकही कछु निज प्रभुताई..!
अस विचरि जे मुनि विज्ञानी..जाचहि भगति सकल गुन खानी..!
यह रहस्य रघुनाथ का बेगी न जानहि कोई..!
जो जानहि रागुपति कृपा सपनेहु मोह न होइ..!!
औरहु ज्ञान भगति कर भेद सुनाहु सुप्रवीन..!
जो सुनी होइ राम पद प्रीति सदा अविछिन..!!
सुनाहु टाट यह अकथ कहानी..समुझत बनाई न जाट बखानी..!
इस्वर अंस जीव अविनासी..चेतन अमल सहज सुखरासी..!
सो माया बस भयहु गोसाई..बंध्यो कित मरकत की नाइ..!
जड़ चेतनहि ग्रंथि पारी गई..जदपि मृषा छुटट कठिनई..!
तब ते जीव भयहु संसारी..छुट न ग्रंथि न होइ सुखारी..!
श्रुति पूरण बहु कहेउ उपाई..छुट न अधिक अधिक अरुझाई..!
जीव ह्रदय तम मोह विसेषी..ग्रंथि छुट किम पराई न देखी..!
अस संजोग इस जब कराइ..तबहू कदाचित होऊ निबरई. ..!
सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई..जो हरि कृपा ह्रदय बस आई..!
जप ताप व्रत जम नियम अपारा..जे श्रुति कह धर्म आचार..!
तेई तरीन हरित चारे जब गई..भाव बच्छ सिसु पाई पेन्हाई..!
मोह निवृत्त पात्र बिस्वासा..निर्मल मन अहीर निज दासा..!
परम धर्म माय पय दुही भाई..अवते अनल अकाम बनाई..!
तोष भगत तब छमा जुदावाई..घृति सम जत्रानु देई जमावै..!
मुदितौ माथे विचरि मथानी..दम आधार राजू सत्य सुबानी..!
तब माथि काढि लेई नवनीता.विमल विराग सुभग सुपुनीता..!
जोग अगिनी तब जारी करि प्रगट तब कर्म सुव्हासुभ लाइ..!
बुद्धि निरवै ज्ञान घृत ..ममता मल ज़री जाई..!
तब विज्ञान रूपिणी बुद्धि..विसद घृत पाई..!
चित्त दिया धरी धरे दृढ ममता दिवटी बनाई..!
तीनी अवस्था तीनी गुन तेहि कपास ते काढि..!
टूल तुरीय संवारि पुनि बाती करे सुधारि..!!
एही बिधि लेन्से दीप तेज रासी विज्ञान माय..!जारही जासु समीप जारही मदाधिप सालभ सब..!!




सोहमस्मि इति वृत्ति अखंडा ..दीप सिखा सोई परम प्रचंडा ..!
अतम अनुभव सुख सुप्रकासा..तव भव मूल भेद भ्रम नासा..!
प्रवाल अविद्य कर परिवारा..मोल आदि तम मिटहि अपरार..!
तब सोई बुद्धि पाई उजियारा..उर गरी बैठि ग्रंथि निरुआरा..!
छोरम ग्रंथि पाँव जो सोई..तब यह जीव कृतारथ होइ..!
रिद्धि सिद्धि प्रेराहू बहु भाई..बुद्धिही लोभ दिखावहि आई..!
कल बल छल करि जाहि समीपा..अंचल बात बुझावहि दीपा..!
होइ बुद्धि जो परम सायानी..तिन्ह तन चितवन अनहित जानी..!
जो तेहि विघ्न बुद्धि नहीं बाधी..तौ बहोरि सुर करहि उपाधी..!
इंडी द्वार झरोखा नाना..जंह तंह सुर बैठे करि धना..!
अआवत देखही विषय वयारी..तब पुनि देहि कपाट उघारी..!
जब सो प्रभंजन उर गृह जाई..तबाही दीप विज्ञान बुझाई..!
ग्रंथि न छूती मिटा सो प्रकासा..बुद्धि विकल भाई विषय बतासा..!
इन्द्रंह सुरन्ह न ज्ञान सोहाई..विषय भोग पार प्रीति सदाई..!
विषय समीर वुद्धि कृत भोरी..तेहि बिधि दीप की धर बहोरी..!

तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावही संसृति कलेस..!
हरि माया अति दुस्तर तरि न जाय बिहगेस..!!
कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन विवेक..!
होइ घुनाच्छर न्याय जो पुनि प्रत्यूह अनेक..!!
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इस प्रकार संत-शिरोमणि तुलसीदासजी ने भक्ति ज्ञान साधना और आत्म-अनुभव के बारे में उपरोक्त चौपाइयो में बहुत ही सटीक-सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला है..!
आज के समय में आत्म-कल्याण चाहने वाले जिज्ञासुओ के लिए इन चौपाइयो में कही गयी बातो का अति महत्त्व है..लेकिन बिना सत्संग और समर्पण किये इनका मर्म पूरी तरह समझ में नहीं आ सकता है..!
गीता में जो ज्ञान भगवन श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को कृक्षेत्र के मैदान में दिया था..क्रमोवेश यहि ज्ञान आत्म-अनुभव है..!
जिसने अपने पिंड में समायी हुई आत्मा का अनुभव कर लिया..उसको परमात्मा से मिलने से कोई शक्ति रोक नहीं सकती है..!
जब तक जीवात्मा इस पिंग में बंधी हुयी है..अर्थात इसमे ग्रंथि पड़ी हुई है..तब तक विशुद्ध-निर्मल-शाश्वत-चिन्मय आत्मा-तत्व का अनुभव कदापि नहीं हो सकता है..!
समत के तत्वदर्शी गुरु की कृपा से ही यह ग्रंथि छूटती या खुलती है..और द्वेत से अद्वेत की ओर जाने का मारी सुलभ हो जाता है..!
जब तक जीव द्वेतावस्था में रहता है..तब तक अद्वेत-परमत्मा से उसका मिलन असंभव है..!
इसी अद्वेत की स्थिति को प्राप्त करने के लिए यह मानव-जीवन एक अवसर के रूप में मिला है..!
वह मानव-जीवन धन्य है..जो इसको प्राप्त कर चूका है..और वह जिज्ञासु धन्य है जो इसको प्राप्त करने में संलग्न है..!
ॐ श्री सद्गुरु चरण कमलेभ्यो नमः...!!

Saturday, April 30, 2011

संसार मंह पुरुष त्रिविध पातळ रसाल पनस समां..!!

ॐ श्री सद्गुरु चरण कमलेभ्यो नमः...!
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संसार में तीन तरह के मनुष्य है...!
रामचरितमानस में लंका कांड में जब रावण अकेला पड़ गया तब वह दुर्बचन कहता हुआ प्रभु श्री रामचन्द्रजी के सामने युद्ध के लिए आता है..भगवन उसे धिक्कारते हुए कहते है की व्यर्थ में वकवास करके जीत की कल्पना मत करो..बल्कि अपनी वीरता दिखाओ..!
प्रभु श्रीरामचंद्रजी कहते है...
सुनी दुर्बचन काल सम जाना...विहांसी बचन कह कृपा निधाना..!
सत्य सत्य तव सब प्रभुताई..जल्पसि जनि देखाऊ मनुसाई..!
जनि जल्पना करि सुजसु नसाहि..नीति सुनहि करहि छमा..!
संसार मंह पुरुष त्रिविध पातळ रसाल पनस समां..!!
एक सुमनपद एक सुमनफल एक फलाही केवल लागही..!
एक कहहि कहहि करहि.अपर .एक करहि कहत न बागही..!!
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अर्थात..संसार में तीन तरह के मनुष्य है..जो क्रमशः..गुलाब..आम और कटहल की तरह अपनी प्रकृति रखते है..!
जैसे गुल में सीधे फुल निकालता है..तो ऐसे किस्म के मनुष्य केवल कहते रहते है..करते कुछ नही है..!
इसी प्रकार आम में पहले बौर(फुल) निकालता है फिर फल(टिकोरे) आते है..तो इस शेणी के मनुष्य कहते है और करते भी है..!
जैसे कटहल में सीधे ही फल निकालता है..तो इसी तरह तीसरे किस्म के लोग जो है..वह केवल करते है..कहते नहीं है..! यही शेणी उत्तम शेणी कही गयी है..!
इस प्रकार मनुष्य की तीन शेनिया हुई..निम्न..माध्यम और उत्तम..!
तभी कहा गया है...
प्राम्भाते न खलु विघ्न भयेन नीचे..प्राम्भ विघ्न विहिता विरमन्ति मध्याः !
विघ्ने पुनः पुनः प्रतिहन्यमाना..प्राम्भामुत्तमजना न परित्यजन्ति..!!
अर्थात.....विघ्नों के भय से निम्न प्रकृति के लोग किसी कार्य को प्रारंभ नहीं करते..!
माध्यम शेणी के लोग कार्य को प्रारंभ कर देते है लेकिन बिच में विघ्न आने पार कार्य को पूरा किये वगैर छोड़ देते है..!
उत्तम शेणी के मनुष्य बार-बार विघ्नों के आने पार भी किसी प्रारंभ किये हुए कार्य को बिना पूरा किये नहीं छोड़ते है..!!
तभी संतो ने कहा...
" कथनी मीठी खांड सी करनी विष सी होय..!
कथनी छोड़ करनी करे विष से अमृत होय..!!
*** अर्थात यही विष की जगह अमृत की प्राप्ति की कामना है..तो उत्तम शेणी के मनुष्य की तरह कथनी छोड़ कर करनी (कार्य-निष्पादन-क्रिया)को अपनाना चाहिए..!
ॐ श्री सद्गुरु चरण कमलेभ्यो नमः....!!