MANAV DHARM

MANAV  DHARM

Sunday, February 27, 2011

"सत्य" एक है.."मुकाम" एक है..रास्ते और रहवर भले ही भिन्न--भिन्न हो..!

"सत्य" एक है.."मुकाम" एक है..रास्ते और रहवर भले ही भिन्न--भिन्न हो..!
जैसे गंगाजी गंगोत्री ग्लेसिएर से निकालने के पश्चात चार धाराओं में..क्रमशः..मंदाकिनी..अलकनंदा..रामगंगा और भागीरथी ..में बाँट जाती है..और चारो ही स्थानों पार चार तीर्थ..क्रमशः..कर्णप्रयाग..नंदप्रयाग..देवप्रयाग और रुद्रप्रयाग..स्थापित है..लेकिन जब गंगाजी की चारो धाराए..ऋषियों की तपोभूमि..ऋषिकेश में पर्वत-मालाओं से निकालकर मैदान में आती है तो एक होकर हरिद्वार में समतल मार्ग से बहती हुयी..बिभिन्न तीर्थ-स्थानों से होकर अंततोगत्वा गंगासागर स्थान पर समुद्र में मिल जाती है.. तो वहा केवल साफर का जल-ही-जल दिखाई देता है और गंगाजी का नामोनिशान मिट जाता है..!
ऐसे ही परम-पिता-परमात्मा का एक ही नाम और एक ही रूप-स्वरूप है..जिसको विभिन्न-पन्थो में भिन्न-भिन्न उपमाओं से लिपिवद्ध किया है..और उसको प्राप्त करने के अनेको रास्ते बतलाये है..लेकिन जब तक किसी सच्चे--पूर्ण-सदगुरू की कृपा-दृष्टि नहीं प्राप्त होती है..तब-तक सत्य की खोज अधूरी ही रहती है..जैसे ही पूर्ण-सदगुरू से मेल होता है..मत-मतान्तरो का एकीकरण हो जता है..और खोज की राह समतल-सपाट हो जाती है..और गंतव्य तक पहुचने में देर नहीं लगाती है..!
गंतव्य तक पहुंचकर जब सत्य से प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है..तब साधक की शारी
पहिचान और नामोनिशान मिट जाता है..!
..फिर तो ..जिधर देखते है..उधर तू-ही-तू दिखलाई पड़ता है..!
अपनी हस्ती बिलकुल मिट जाती है..!

Saturday, February 26, 2011

"समत्व-योग" क्या है..?

अध्यात्म का वाही "शिखर-पुरुष" है ..जो "समत्व-योग" में स्थित है..!
"समत्व-योग" में स्थित साधक साक्षात ब्रह्म के सामान है..!
वह सद्फुरुदेव जी महान है..जिसकी कृपा से एक साधक इस सोपान तक पहुँच जाता है..!
"समत्व-योग" की सिद्धि अनन्य-भक्ति ...प्रखर --साधना ..अवाध-तपश्चर्या और निर्लिप्त-कर्म के अक्षुन्य-संयोग का फल है..!
"समत्व-योग" क्या है..?
यह वाणी का विषय नहीं ..अपितु करनी का विषय है..!
शाब्दिक मीमांसा की जाय तो यह स्पष्ट है कि..समानता की स्थिर-स्थिति को समत्व-योग कहते है.!
प्रश्न यह उठाता है की..समानता और उसकी स्थिर-स्थिति से आशय क्या है..?
आध्यात्मिक द्रष्टि से देखे तो..इस स्थूल पिंड में समाई हुई सुक्ष्म चेतना (प्राण) का पान-अपान की क्रिया में समान-रूप से आना--जाना ही समत्व-योग है..!
जब तक गुरु-कृपा से साधक की श्रुति(मन) का शब्द(ब्रह्म) से मेल नहीं होता..तब तक इस समत्व- योग की सिद्धि असंभव है..!
इस प्रकार आध्यात्मिक साधना ..एक प्रकार से शिष्य का गुरु से..श्रुति का शब्द से..जीव का ब्रह्म से.और .पान-अपान का सामान से मेल-मिलाप की अप्रतिम- अलौकिक साधना है.!
यही.."हंस-योग-प्रकाश" है..!..जिसे हम UNION WITH LIGHT भी कहते है..!
..आईये....एक सच्चे साधक की भाति सदगुरुदेव जी की सेवा करते हुए इस अलौकिक सिद्धि- सोपान तक पहुचने का सत्प्रयास करे..!

आज का समय बौद्धिकता की दृष्टि से समुन्नत होते हुए भी मानसिक वैचारिगी से ओत-प्रोत है..!

आज का समय बौद्धिकता की दृष्टि से समुन्नत होते हुए भी मानसिक वैचारिगी से ओत-प्रोत है..!
ऐसा इसलिए है..क्योकि व्यक्ति की मानसिकता स्थिर न होकर चलायमान है..!
आज के सामाजिक...आर्थिक..राजनीतिक..शैक्षणिक..और धार्मिक परिवेश की ओर जब हम दृष्टिपात करते है ..तो यह देखते है कि..इतने मत-मतान्तर..परिदृश्य पार बादलो की तरह छाए हुए है कि आज का मानव कोई एक मत अपने मानसी धरातल पार स्थिर नहीं कर सकता है..!
न तो सही चिंतन हो पाटा है और न ही सही राह सुझाती है और न ही मार्ग दिखाने वाला ही दीखता
हर क्षेत्र में उलझाने ही उलझाने भरी हुयी है..कोई सुलझानेवाला भी है..तो..भी मनुष्य की मानसिकता इतनी संकीर्ण है कि वह उनको देखना..सुनना और पहचानना भी नहीं चाहता है..!
इस प्रकार उसके विचारों में दोष तो है ही..दृष्टि-दोष भी उसकी मानसिकता को पंगु करके उसका भरपूर-भक्षण कर रही है..!
सोचने-समझाने कि बात है..जब किसी बस्तु का उसके नाम ..गु और रूप को जाने बिना पहचान नहीं कि जा सकती है तो..फिर इसे किसी के यह कह देने से कि अमुक चीज ऐसी है या वैसी है..कोई उसका फनकार कैसे हो सकता है..?
आज-कल यही हो रहा है.. अज्ञानता और पाखण्ड मानव के अन्दर कूट--कूट कर भरे हुए है..जैसे धन में भूसी मिली रहती है..वैसे ही इनके विचारों में गर्द और गन्दगी दोनों ही समाई हुयी है..!
जब तक गर्द-गन्दगी को साफ़ करने के लिए सूप--छन्नी का ज्ञान नहीं होगा..सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा और मानव पशुवत जीवन जीता रहेगा..!
जो ज्ञानी..संत--पुरुष होते है..उनकी वृत्ति सूप--छन्नी की तरह होती है..वह सार --सार की बाते समझाते--बताते है..और ऐसा prayaas करते है कि..सीधे--सीधे पके हुए फल का स्वाद जिज्ञासु को आसानी से मिल जाय..और नए सिरे से पेड़ उगाकर उसमे फल लगने--पकाने तक की प्रतीक्षा न करनी पड़े..!
इसीलिए कहा है...
"सद्गुरु को पहचानो..उस " नाम " को सब जानो..!
छन्नी को ले भक्तो..! उस नाम को सब छानो..!!
....आवश्यकता है..मानव को अपने--आपको बदलने की और अपने दुर्लभ मनव०जिवन के वास्तविक ध्येय और वास्तविक लक्ष्य को जानने--समझाने की..!
जब तक कोई द्रष्टा -पुरुष या पथ--प्रदर्शक नहीं मिलेगा..मानव भटकता सा ही रहेगा..और जीवन के वास्तविक सुख से बंचित होता रहेगा..!

Friday, February 25, 2011

Why our sensory organs receive evils immediately..??

Why our sensory organs receive evils immediately..??

This is a burning question to be resolved..

The flat answer is that..we are wide open with our nostrils..eyes..ears..tongue n throat..!

All these major sensory organs..looking..hearing..smelling n tasting are located on the peak of our very person..!

So we receive external raw--materials immediately..!
The king of all these sensory organs is our MIND..which reflects to the utmost towards receiving the evils.!

This is the major cause of our tale of woe..!

The more we close all these sensory organs..the more we reach closer to our very self..!

Ofcourse...it is the "self-awakeming"..which provides the potential yo strengthen us..! Once u r awakened with ur very self..then u r well-done..! It is possible..only when u join the TRUE PATH..!

The process of following the TRUE PATH leads towards enjoying the eternal bliss..!
By virtue of self-transcendance..an aspirant attains the equillibrium of the self..It is a state of supreme consciousness..which provides the potential f...or self-realization..It can be attained only when atrue spiritual master of the time leads n provides inspiration to the seeker..@..There is exactly no need to renounce the wold or live n prefer an ascetic life.!..The JOY ...delight...is just an ingredient part of the Subtle Being...ATMA.. which gets awakened only when the seeker follows a true guru..!See More

Thursday, February 24, 2011

"ध्यान" अपनी बिखरी हुयी शक्तियों को समेटकर "ध्येय " बस्तु का एकाग्रता से चिंतन करने की अलौकिक विधा है..!

"ध्यान" अपनी बिखरी हुयी शक्तियों को समेटकर "ध्येय " बस्तु का एकाग्रता से चिंतन करने की अलौकिक विधा है..!
जब तक व्यक्ति बहिर्मुखी होकर सांसारिक कार्यो में लिपायमान रहता है..उसकी शक्तिया बिखरती जाती है..जैसे ही वह अंतर्मुखी होकर ध्यान-योग से अपने अन्दर प्रवेश करता है..तो उसकी स्थिति कछुवे जैसी हो जाती है..!
यह एक ऐसी अद्भुत-अलौकिक क्रियायोग है..जिसे व्यक्ति समय के तत्वदर्शी महान-पुरुष के सानिध्य में आकर ही जान सकता है..!
ध्यान करने की विधि और ध्येय बस्तु का ज्ञान स्वयं नहीं जाना जा सकता..यह तत्वदर्शी-गुरु द्वारा ही बताया और जनाया जाता है..!

जैसे  कछुआ हमेश  अपने  अंगो  को  अन्दर  की ओर  समेटे रहता है..जब  आवश्यकता  होती  है  तभी  वह   बाहर  निकालता  है..वैसे  ही  जब  हम  अपनी  सभी इन्द्तियो  के  दरवाजो  को  बंद  करके अपनी  चेतना  को भृकुटी के मध्य आज्ञा-चक्र में  एकाग्र  करते  है..तो  हम  अंतर्मुखी  होने  लगते है..बाहरी दुनिया  की  मानसिक--शारीरिक  भगा-दौड़ क्षण-भर के लिए  बंद होती  सी  होती  प्रतीतहोती  है.. !
हम  इस  मानव देहमें  कुल नौ  दरवाजो  से  खुले  हुए  है..जब तक  यह  सभी  दरवाजे  बंद  नहीं  होगे..हम  बहार--ही  रिसते  रहगे..और  हमारी शक्ति  बेकार  ही  बिखरती  रहेगी..जैसे  ही अभ्यास-योग  से  गुरु द्वारा  बताये  हुए  साधन  को  हम  अपनाने  में  लग  जाते  है..हमारी  चित्त-वृत्ति  अंतर्मुखी  होने  लगाती  है..!
इस  अभ्यास से  चेतना  का  बंद  दरवाजा..दसवा-द्वार..खुलने  लगता है..और  हमें  अलौकिक शक्तियों  की  अनुभूति  होने  लगाती है..! यही  शांत-चेतना..अंतर्मन  की  प्रकृति  है.!
कछुवे  की  आयु  इसीलिए  बहुत  अधिक  होती  है..क्योकि  वह  हमेशा  अन्दर  की  ओर  सिमटा  रहता है..ठीक  इसीप्रकार  जब   हम  भी  अपने  अन्दर  ही  पैठ  बना  लेगे  तो  हमारी  आयु और  शक्ति  भी  बढ़  जायेगी...!
इसीलिए  कहा है....
कथनी  मीठी  खांड-सी..करनी  विष-सी होय..कथनी  छोड़  करनी  करे..विष से  अमृत  होय .!!
..यही  मानव-जीवन  की  महानतम  उपादेयता  है..!

Wednesday, February 23, 2011

सदैव समकालीन तीन महान विभूतिया विद्यमान रहती है....!

सदैव समकालीन तीन महान विभूतिया विद्यमान रहती है....!
एक "समय का राजा"..दूसरा "समय का वैद्य"..तीसरा.."समय का तत्वदर्शी गुरु" ..!
किसी एक राष्ट्र में समय का राजा..वहा का राष्ट्राध्यक्ष होता है..जो राज्या की प्रजा की रक्षा..उसके हित-चिंतन और जन-कल्याण के लिए उतार्दायी होता है..जैसे एक लोकतंत्र में मुख्यमंत्री..या प्रधानमंत्री..जिसके पास जाकर कोई भी अपनी फ़रियाद कर सकता है..!न कि राजा विक्रमादित्य के पास..जो कि अतीत में समां चुके है..?
किसी भी देश--काल में रोग के निदान के लिए..वैद्य भी सदैव विद्यमान रहते है..जो विभिन्न रोगों के निदान-उपचार के लिए तत्पर रहते है..जैसे मोतियाबिंद के लिए आँख के शल्य--चिकित्सक..! तो ऐसे ही शल्य चिकित्सक के पास जाकर आँख के मोतियाबिंद का ऑपरेशन सुगमता से करा सकते है.! न कि वैद्य धन्वन्तरी के पास जायेगे..जो अतीत में समां चुके है.?
इसी प्रकार कर समय और देश-काल में समय का तत्वदर्शी महान-पुरुष भी सदैव से विद्यमान रहते है..जो मनुष्य में व्यापक माया-मोह जनित विकारों और सांसारिक-दुखो की पीड़ा को आत्म-तत्त्व- ज्ञान का प्रकाश देकर उनका कल्याण कर देते है..!जैसे राम..कृष्ण..बुद्ध..महावीर..विवेकानंद..कबीर.तुलसीदास.गुरु नानकदेव..रैदास..इशामसिः..मोहम्मद पैगम्बर..इत्यादि..!
इसीलिए रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी कहते है...
" सबही सुलभ सब दिन सब देसा..सेवत सादर शमन कलेसा..!
अकथ अलौकिक तीरथ राऊ..देई सद्य फल पकट प्रभाऊ..!!"
प्रथम दो विभूतियों को तो आज का मनुष्य आसानी से तलाश केता है..लेकिन..समय के तत्वदर्शी महान-पुरुष की तलाश करना आसन नहीं है..!जैसे कबीर को रामानंद जी मिले..विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस जी मिले..श्री हंस्जी महाराज को स्वामी स्वरुपनान्दजी मिले...वैसे ही..जब हम ऐसे महान-पुरुषो की तलाश में निकलेगे..तो निश्चय ही हमें इनका सानिध्य प्राप्त होगा..और हम फिर पीछे मुड़कर नहीं देखेगे..आगे ही आगे बढ़ते चले जायेगे..!
इसीलिए कहा गया कि.." उत्तिष्ठ..जाग्रत..प्रप्यावरान्निवोद्हत.."..कि हे मानव..! उठो..जागो..और अपने लक्ष्य की प्राप्ति करो..!

Tuesday, February 22, 2011

कलियुग का पांचवा आश्चर्य..एक दोमुहा हाथी...है..!

कलियुग का पांचवा आश्चर्य..एक दोमुहा हाथी...है..!
महाभारात्कील में सहदेव जी ने इसे देखकर भगवान श्रीकृष्णजी से पूछा...कि..भगवन..यह क्या है..??
भगवान श्रीकृष्ण जी ने जबाब दिया.....यह कलियुग की राजनीतिक..सामाजिक..चारित्रिक पतन का प्रतीक है..!
कलियुग में राजनीति इतनी पतानोंमुखी हो जाएगी कि..परदे के सामने कुछ और तथा परदे के पीछे कुछ और ही खेल होगा..! कथनी--करनी में जमीन-आसमान का फर्क
होगा..जिससे व्यक्ति की सामाजिक और चारित्रिक स्थिति दूषित और शर्मनाक होगी..!

आज के युग में यह सब अक्षरशः सत्य चरितार्थ हो रहा है..! हम जिधर देखते है..अंधेरगर्दी..भ्रष्टाचार..कदाचार..अनाचार..दुराचार..पक्छापात..लुट-खसोट..उत्पीडन..आतंक..ह्त्या..मार-पीत--छीनाझपटी..जोर-जबरदस्ती..शाह-मात..इत्यादि विकृतिया उत्पन्न हो गयी है..जो आज की सामाजिक--आर्थिक--चारित्रिक..राजनीतिक व्यवस्था पार पूर्णतः हावी है..!
ऐसे घोर-कलिकाल में केवल डूबते को तिनके का सहारा मात्र ही एक रास्ता शेष है..जो मानव को इन सभी आपदाओं और विकृतियों से रक्षा करने में सक्षम है..!
इसी तिनके का ज्ञान हमें समय के तत्वदर्शी महान-पुरुष की शरण में आने पार प्राप्त होता है..!
एक बार जब हम गोबर्धन पर्वत के नीचे आ जाते है..तब हमारी पूरी रक्षा हो जाती है..!
इसलिए कहा है....
"आपदाहर्तारम दातारम सर्वसम्पदाम....लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो--भूयो नमाम्यहम.."!
समय के तत्वदर्शी महान-पुरुष साक्षात् गोविन्द ही होते है..इसलिए...हमें इसकी खोज काके उनकी शरणागत होना चाहिए..!

Monday, February 21, 2011

कलियुग केवल नाम अधारा..सुमिरि-सुमिरि नर उतरहि पारा..!

कलियुग का जो दूसरा आश्चर्य भीम ने महाभारतकाल में देखा...वह..एक "तिनका " है..!
भीम ने देखा कि..एक नाम--मात्र के तिनके के स्पर्श से विशालकाय पर्वत चकनाचूर हो गया.!
श्रीकृष्ण भगवान ने हसते हुए इसकी निम्नवत व्याख्या की....
कलियुग में ऐसा ही होगा..!बड़े से बड़े दुःख और दुर्गम संसार सागर से मुक्ति इस तिनके से ही होगी..!..!
आगे भगवान कहते है...यह तिनका ही मेरा पावन--नाम है..जिसके स्मरण-मात्र से भव-सागर भी सुख जाएगा..!!
संत-शिरोमणि तुलसीदासजी कहते है..
"नाम लेत भव-सिन्धु सुखाही..करो विचार सुजन मन माही..!
आगे कहते है..


कलियुग केवल नाम अधारा..सुमिरि-सुमिरि नर उतरहि पारा..!
नहि कलिकर्मा न भगति विवेकू..राम-नाम अवलम्बन एकू..!!


...यह "नाम" ही परम-अक्षर..एकाक्षर..सतनाम..शब्द-ब्रह्म..divine-name..महामंत्र..आदि-सत्य..अमृत-नाम..इत्यादि के रूप में जाना जाता है..!

गुरुनानाक्देव्जी कहते है....

एको सुमिरो नानका..जल-थल रहे समाय..दूजा काहे सुमिरिये जो जन्मते ही मर जाय..!!
अर्थात..जल-थल में एक ही नाम समाया हुआ है..उसी का ज्ञान सदगुरुदेव्जी से प्राप्त होता है..!
इसके अलावा जो नाम है वह मुख से बोलते ही समाप्त हो जाता है..!रामचरितमानस के
बालकाण्ड.."नाम-रामायण" में संत शिरोमणि तुलसीदासजी कहते है..

' बंदौ नाम राम रघुवर को..हेतु कृसानु भानु दिनकर को..!
....
सुमिरि पवनसुत पावन नामु..अपने बस करि रखे रामू..!
...
नाम प्रभाऊ जान गणराऊ..प्रथम पुजियत नाम प्रभाऊ..!
...
नाम प्रभाऊ जान शिवानीको..कालकूट विष पीय अमी को..! !
...
महामंत्र जोई जपत महेशु..कासी मुकुट हेतु उपदेह्सू..!
...
सहस्रनाम सुनि शिव वानी..जप जेई शिव संग भवानी..!
...
मंगल भवन अमंगल हारी..उमा सहित जेई जपत पुरारी..!
इसप्रकार..यह पावन नाम ही सर्वदा-सर्वकाल में विद्यमान रहता है..यही सच्चिदानंद परमेश्वर का सर्वव्यापक नाम है..जिसका ज्ञान समय के तत्वदर्शी महान-पुरूष से प्राप्त होता है..!


झुकाते वही है..जिसमे जान होती है..!

झुकाते वही है..जिसमे जान होती है..!
अकड़े रहना तो मुर्दे की पहचान होती है..!!
भाव स्पष्ट है..जो जीवंत..विनीत ..निर्मल और सदाशयी होते है..वही अपने सदगुणों के कारण झुक जाते है..पाखंडी कदाचारी और अहंकारी लोग मुर्दे की तरह हमेशा अकड़े रहते है..!!
रामचरितमानस में संत तुलसीदासजी कहते है......
बरसाही जल्द भूमि नियराये..जथा नवहि बुध विद्या पाए..!
...चुकी बादलो में जल-रूपी जान है..इसलिए वह नीचे धरती पर आकर बरसते है..ऐसे ही एक बौद्ध (ज्ञानी) जब ज्ञान (विद्या) प्राप्त कर लेता है..तो सभी सदगुण उसके प्रभामंडल से ज्ञानालोक के रूप में प्रस्फुटित होने लगते है.!
भव यह है कि..मनुष्य सदगुणों कि खान है..यही उसकी जान और पहचान है..और इसी का ही उसको विकास करना है..जिससे वह सही अर्थो में मानव कहला सके..!

Sunday, February 20, 2011

सुधा--सूरा सम साधु असाधू..जनक एक जग जलधि अगाधू..!

"साधू"  शब्द  सुनते  ही   लोगो  के  मन  में  तुरन्त  हलचल  पैदा  हो  जाती है..!
कोई  आज  के  जमाने  में  किसी  भगवा  पहने  इंसान  या  प्रवचन  करते  स्वाधिश्ताता
पुरुष  को  जरा  सा  भी  सम्मान  की  दृष्टि  से  नहीं  देखना  चाहता..!
सांसारिक   लोगो  की  नजर  में यह  सब  पैसा  कमाने  यों  ठगी  कने  के  तरीके है..!
प्रश्न  यह  नहीं  की..ऐसे  लोग  साधू  है  या  असाधू  है..?
प्रश्न  यह  है..की  धर्मं  शाश्त्रो  के  अनुसार  साधू..या  संत--पुरुष और  असाधू  या  दुष्ट-जन  किसको कहते  है..?
रामचरितमानस  में  संत  तुलसीदासजी  ने  दोनों  की  ही  बंदना  की  है  और  उनकी  स्वाभाविक  प्रकृति   को भली-भाति समझाया है.! गोस्वामीजी कहते है..
सुधा--सूरा सम साधु असाधू..जनक एक जग जलधि अगाधू..!

भाल-अनभल  निज-निज  करतूती..लहत सुजन अपलोक विभूति..!
सुधा  सुधाकर  सुरसरि   साधु...गरल अनल  कलिमल स्री   व्याधू..!
गुन अवगुण जानत  सब  कोई..जो  जेहि  भाव  नीक  सोई  तेही..!
     भली  भलाइहि   पे  लहहि..लहहि  निचाइहि   नीचु..!
     सुधा  सराइही    अमरता..गरल  सराइही    मीचु..!!
खल अघ  अगुन  साधु  गुन  गाहा..उभय  अपार  उदधि  अवगाहा..!
जेहि  ते  कछु  गुन  दोष  बखाने..संग्रह  त्याग  न  बिनु  पहिचाने..!
भालू  पोच  सब  बिधि  उपजाए ..गति गुन दोष  वेद  विलागाये..!
कहहि  वेद  इतिहास  पुराना..बिधि  प्रपंचु  गुन   अवगुन नाना..!
दुःख-सुख पाप-पुन्य दिन-राती..साधु-असाधू  जाति-कुजाती..!
दानव-देव  ऊच  अरु  नीचु..अमिय  सुजीवनु  माहुर  मीचु..!
माया  ब्रह्म  जीव  जगदीशा..लच्छि  अलच्छि  रंक  अवनीषा..!
कासी  मग  सुरसरि  कमनासा..मरू  मारव  महिदेव  गवासा..!
सरग नरक  अनुराग  विरागा..निगमागम  गुन  दोष  विभागा..!
   जड़  चेतन गुन दोषमय..विश्व कीन्ह  करतार..!
   संत  हंस गुन  गहहि  पय..परिहरि  वारि  विकारि..!!
अस  विवेक  जब  देई  विधाता..तब  तजि दोष गुनहि  मनु  राता..!
काल  सुभाऊ  करम  बरियाई..भलेहि  प्रकृति  बस  चुकही   भलाई..!
लखि  सुवेश  जय  बंचक  जेऊ..वेष   प्रताप  पुजीयाही  तेऊ..!
उघरही  संत  न  होई  निवाहू..कालनेमि  जिमि  रावण  राहू..!
किएहु  सूवेशु  साधु  सनमानू..जिमि  जग  जामवंत  हनुमानू..!
हानि  कुसंह  सुसंगति  लाहू..लोकहु  वेद  विदित  सब  काहू..!
गगन  चढ़ाई  रज  पवन  प्रसंगा ..कीचहि मिलहि नीच  जल  संग..!
साधु अस्स्धू  सदन  सुख  गारी..सुमिरही राम  देहि  गाणी  गारी..!
धूम  कुसंगति  कारिख  होई..लिखीय  पुराण  मंजु  मसि   सोई..!
सोई  जल  अनल  अनिल  संपाता..होई  जल्द  जग  जीवन  दाता..!!

इसप्रकार  संत-शिरोमणि  तुलसीदासजी  ने  भालीभाती  साधु  और  असाधू के  बारे  में  भालीभाती  उपमा सहित  समझा  दिया  है..!
जिसके  ज्ञान-चक्षु खुल गए  है..वह  इसको  बहुत  आसानी  से  समझ  जायेगे..और  जो अभी तक
अज्ञानान्धकार में दुबे  हुए  है..वह इस मीमांसा  को  कदापि  नहीं समझ  सकते..!





  




 

 

Saturday, February 19, 2011

लीक-लीक गाड़ी चले..लीके चले कपूत..!
तीन शख्स उलटा चले..साधू--सिंह--सपूत..!!"


जैसे गाड़ी सड़क और रेलगाड़ी पटरी पर दौड़ती है..वैसे की बने--बनाये और घिसे--पिटे रास्ते पार चलनेवाले लोग कुपुत्र होते है.. इस लीक से हटाकर क्रमश संत--पुरुष..शेर और सुपुत्र ..यह तीन शख्स बिलकुल विपरीत-मार्ग पर चलते है..!
"संत-पुरुष" वह है..जिनका दिल--दिमाग पूर्ण विश्रांति और वैराग्य में रहता है और जो सहज-शान्ति ..सहज--संतुष्टि..सहज--सुख..सहज-ज्ञान..सहज--योग..सहज-समाधि में लीं रहते है..!
"शेर" जंगल का रजा होता है..अपना शिकार खुद करता और उसका भक्षण करता है और भक्षण किये शिकार की तरफ फिर पीछे मुड़कर नहीं देखता..हमेह्सा निर्भीकता से आगे ही देखता जाता है..!
"सुपुत्र" वह है..जो स्वाध्याय ,,सत्प्रयास और सत्कर्म से अपना रास्ता खुद बनाते है..हमेह्सा मौलिक चिंतन करते है..सुख--दुःख में सम-भव रखते रहते हुए सन्मार्ग पर स्वयं चलते और दूसरो को भी ले चलते है..!
भाव यह है..कि आधुनिक दुनिया की भीड़ में सब भाग--दौड़ कर रहे है..सही रास्ता कुछ--कुछ लोगो को ही सुझाता है..यही सत्पुरुष लोग सन्मार्ग पर चलाकर इस दुर्गम संसार-सागर से पार हो जाते है..!

Friday, February 18, 2011

मानव जीवन एक अनमोल निधि है..!

मानव जीवन  एक  अनमोल  निधि  है..!
आज  का  विश्व  सूचना--प्रोग्योगिकी--दूर-संचार  क्रांति  के  अधुनातन  युग  में  है..!
इस  क्रान्ति  ने  सभी  पूर्ववर्ती  क्रांतियो  को  बहुत  पीछे  छोड़  दिया  है..!
हमें  जीवन  के  हर  क्षेत्र  की  घर  बैठे  इलेक्ट्रोनिक डेलिवेरी  के  माध्यम  से  शारी  अधारभूत  सेवाए  और   जानकारिय  प्राप्त  हो  जाती  है..!
इसप्रकार  हमारे  अनमोल समय..धन..संसादन..परिश्रम  की  बचत  होती  है  और भटकन  से मुक्ति मिल  जाती  है..!
इतनी  अत्याधुनिक सुविधाए  और  तकनीक  प्राप्त  हो  जाने  के  बाबजूद  भी  आज  का  मानव  अपनी  मानसिकता  में  कितनी तरक्की कर  पाया  है.?  .
आज  भी "धर्म"  के  नाम  पार  मानव  के  मानसिकता  कुंठित ही  है..!
सवामी विवेकानंद  जैसे  महँ-पुरुष  ने  भारत-माँ  की  कोंख  से  जन्म  लेकर  दुनिया  को  अध्यात्मा  का  रास्ता  दिखाया..और  समझाया  कि.."RELIGION  IS  REALIZATION
..अर्थात....धर्म  अनुभूति  का विषय  है..!
इस  श्रृष्टि  के  कण--कण  में  एक  ऐसी  अप्रतिम  सत्ता ..सार्वभौम-तत्व  रमा  हुआ  है..जिसे  केवल  मानव  ही जान--समझ  और  अनुभव  कर  सकता  है..!
क्योकि  मानव  के  पास  मन--तंत्र  है..इसीलिए वह  मानव  कहलाता है..!
जलचर--थलचर--नभचर  में  केवल  एक  ही  जीवन  जीवंत  है..!
विज्ञान  कहता  है.".जिस  MATTER  का
घनत्व(DENSITY) ज्यादा  होता  है..उसका  आयतन(VOLUME) उतना ही कम  होता  है.." 
जैसे  वर्फ  का  घनत्व  ज्यादा  है..तो  उसका  फैलाव  कम  है..पानी  का  घनता  कम  है  तो  उसका  फैलाव  ज्यादा  है..इसीप्रकार  वाष्प  का  फैलाव  अत्यधिक  होने  से  उसका  घनत्व  बहुत  ही न्यून है..!
तात्पर्य  यह  है  कि..स्थूल  वर्फ  से  सुक्ष्म  पानी  और  उससे  भी  सूक्ष्मतम  वाष्प..यह  ऐसा  स्टार  है..जो  इस  सृष्टि  के  जीवो..स्थावर..जलचर--नभचर--थलचर..की  प्रास्थिति  को  स्पष्ट  करते है..!
सिंहावलोकन  किया  जय..तो  यह  स्पष्ट  है..की  स्थूल  शरीर वाले  मानव  में  सूक्ष्म गति वाले  मन  रूपी  चेतना  की  उपस्थिति  है..!
इसीलिए  मानव सब जीवधारियो में श्रेष्ठ है..!
सुक्ष्म चेतना   (आकाश-तत्त्व) क्रियाशील होकर  शनै--शनै  नीचे  आकर इस  भूलोक में  मानव-रूपी  पिंड  में  समां गया है..और  उसी  के  माध्यम से सारी  लौकिक क्रियाये  कर रहा है..
इसप्रकार  इस  मन  में  जो  चेतना  धारित  है..वाही  हमारा  धर्मं  है..
यह  चेतना-शक्ति  ही  सभी  क्रियायो  के  मूल  में है..
हम  इसको  एक  क्रिया-विधि  से  अनुभव  कर  सकते  है..!
यहि  क्रिया-विधि  अध्यात्म  का  विषय  है..!
अपने--आपका  अध्ययन  ही  अध्यात्म  है..!
चुकी..सुक्ष चेतना  अगोचर  है..इसलिए  इसको देखने--जानने  के  लिए  हमें  एक  पथ-प्रदर्शक  की आवश्यकता  पड़ती है..जो  इस  अलख  को  पारदर्शी   कर  देते  है..!
..भव  यह  है..हम  जितना  भी  तरक्की  कर  ले...अपने-आपको जानने  के लिए  हमें  स्वयं  अपने--आप  का  ही  साधन  करना  है..और  एक  पथ--प्रदर्शक  द्रष्टा  के  सानिध्य  में  रहना है..तभी  धर्मं  की अनुभूति   प्राप्त  हो  सकती  है..!

wHAT IS GREATER.......??

....THERE IS.... NO WILL..GREATER THAN SALVATION..!
NO POWER GREATER THAN SERPENT-POWER..!
NO LEADERSHIP GREATER THAN SELF-MOTIVATION..!
NO EMINY GREATER THAN LAZINESS..!
NO RICHNESS GREATER THA THE KNOWLEDGE OF DIVINE NAME..!
...NO HELP GREATER THAN SUPPORT TO THE DESTITUTES N ORPHANS..!
NO LEADERSHIP GREATER THAN SLF-MOTIVATION..!
NO YOGA GREATER THA "ASHTANG-YOGA".!
NO RIVALRY GREATER THAN NOTORITY..!
NO MISCHIEF GREATER THA ILLUSION..!
NO EXPERTISE GREATER THAN EQUILLIBRIUM OF THE BREATH..!

NO KNOWLEDGE..GREATER THAN SPIRITUALITY (TATVA-GYAAN)..
NO MASTER..GREATER THAN SPIRITUAL MASTER OF THE TIME..!
NO MOTHER..GREATER THAN MOTHERLAND..!
NO FRIEND.GREATER THAN PATIENCE..!

NO ASPIRATION..GREATER THAN..SELF--ATTAINMENT..!

NO WISH GREATER THAN..UNIVERSAL BROTHERHOOD..! (GOODWILL TO ALL )
NO LOVE GREATER THAN DEVOTION
NO WORSHIP GREATER THAN DEDICATION(SURRENDER OF THE MIND )..!
NO SCHOOL GREATER THAN..EXPERIENCE (SELF-REALISATION)
NO TEMPLE GREATER THAN THE SHRINE OF THE KNOWLEDGE..!
NO PILGRIMAGE..GREATER THAN THE ACCOMPANIMENT OF SAINTS..
NO ADORATION..GREATER THAN..THE SERVICE OF A TRUE GURU..!
NO ALMS GREATER THAN THE SURRENDER OF THE MIND IN TO THE FEET OF REAL SPIRITUAL MASTER..
NO FORM GREATER THAN THE HUMAN SAPION (MANAV-TAN)
NO DEBATE(DISCOURSE) GREATER THAN THE SPIRITUAL DISCOURSE(SATSANG)
NO CRIME GREATER THAN HATRED AND ILL--WILL TO OTHERS..!NO PATH GREATER THAN..TRUE-PATH..!
NO BEAUTY GREATER THAN DIVINITY..!
NO CHARM..GREATER THAN INSPIRATION..!
NO QUEST GREATER THAN THE QUEST FOR TRUTH..!
NO EDUCATION GREATER THAN REALIZATION..!
NO LIFE GREATER THAN HUMAN-LIFE WITH SPIRITUAL-ENLIGHTENMENT..!
NO VICTORY GREATER THAN THE VANQUISH OF MIND..!
NO SANITY GREATER THAN ALIENATION FROM WORDLY PLEASURE.!
NO DELIGHT GREATER THA THE CONCENTRATION OF MIND.!

सद्गुरु ही कल्याण करने में सक्षम है...!

संत रविदासजी ने अपनी निर्मल-भक्ति और ताप-साधना से चरितार्थ किया.."जब मन चंगा..तो कठौती में गंगा..!"
उन्होंने मीराभाई जैसी भक्त को..अपने सामने चमडा भिगोने के लिए रखी पानी की छोटी-सी कठौती में गंगाजी को प्रगट करके सोने का दूसरा कडा दे दिया..!
मीराबाई इस अलौकिक दृश्य को देखकर उनसे इतना प्रभावित हुई कि..उन्होंने संत रव्ज्दास्जी को अपना गुरु बना लिया..और गुरु-दीक्षा में प्राप्त ज्ञान को पाकर धन्य हो गयी..!
मीराबाई ने भजन गया....
"पायो जी ! मै तो नाम रतन धन पायो..!
बस्तु अमोलन दीन्ह मेरे सद्गुरु..कर कृपा अपनायो..!
चोर न लेवे..खर्च न होवे दिन-दिन बढ़त सवायो..!
जनम-जनम की पूंजी पायी..जग का सभी गवायो..!
सत की नाव खेवानिया सद्गुरु..भव-सागर तर आयो..!
मीरा के प्रभु गिरधर-नागर.. हर्ष-हर्ष जस गायो..!
तो भाव यह है कि..सच्चे गुरु के मिलने से ही हम इस दुर्गम संसार--सागर से पार हो सकते है..!

Wednesday, February 16, 2011

"..सत्यम..शिवम्..सुन्दरम..".......!!

"..सत्यम..शिवम्..सुन्दरम.."
अर्थात..जो "सत्य" है..वाही "शिव" है..और वही "सुन्दर" है..!
..जो "सुन्दर" है..वही "सौन्दर्य" है..!
..जो "सौन्दर्य" है..वही "आकर्षण" है..!
..जो "आक्शन" है..वही "कृष्ण" है..!
..जो "कृष्ण" है..वही "दिव्य" है..!
..जो "दिव्य" है..वही "प्रेम" है..वही "करुना" है..वही "दया" है..वही "छमा" है..वही "वात्सल्य" है..वही "तेज" है..वही "ऐश्वर्य" है..वही व्यापक" है..वही "बलवान" है..वही "द्रष्टा" है..वही "कर्ता..भर्ता..हर्ता" है..वही "प्रकाशक..प्रकाशित..प्रकाशवान" है..वही "गुणवान..गुणज्ञ..गुनातीत" है..वही "ऐश्वर्यवान..बलवान..तेजवान" है..वही "पुरुषोत्तम" है..वही "एकाक्षर" है..वही "सर्वव्यापक..सच्चिदानंद..सर्वज्ञ" है.वही "आदि..मध्य..अंत" है...!!
...इस "दिव्य ..दिव्यतम..दिव्यातीत"..परम--प्रभु--परमेश्वर के गुण वर्णनातीत है..!
...."सत्य" ही परमात्मा है..परमात्मा ही "सत्य" है..!..वही "सत्य--नारायण" है..!
..अतः परमात्मा को पाना है तो..सत्यनिष्ठापूर्वक सदाचरण सर्वोपरि--साधन है..!!! अर्थात..जो "सत्य" है..वाही "शिव" है..और वही "सुन्दर" है..!
..जो "सुन्दर" है..वही "सौन्दर्य" है..!
..जो "सौन्दर्य" है..वही "आकर्षण" है..!
..जो "आक्शन" है..वही "कृष्ण" है..!
..जो "कृष्ण" है..वही "दिव्य" है..!
..जो "दिव्य" है..वही "प्रेम" है..वही "करुना" है..वही "दया" है..वही "छमा" है..वही "वात्सल्य" है..वही "तेज" है..वही "ऐश्वर्य" है..वही व्यापक" है..वही "बलवान" है..वही "द्रष्टा" है..वही "कर्ता..भर्ता..हर्ता" है..वही "प्रकाशक..प्रकाशित..प्रकाशवान" है..वही "गुणवान..गुणज्ञ..गुनातीत" है..वही "ऐश्वर्यवान..बलवान..तेजवान" है..वही "पुरुषोत्तम" है..वही "एकाक्षर" है..वही "सर्वव्यापक..सच्चिदानंद..सर्वज्ञ" है.वही "आदि..मध्य..अंत" है...!!
...इस "दिव्य ..दिव्यतम..दिव्यातीत"..परम--प्रभु--परमेश्वर के गुण वर्णनातीत है..!
...."सत्य" ही परमात्मा है..परमात्मा ही "सत्य" है..!..वही "सत्य--नारायण" है..!
..अतः परमात्मा को पाना है तो..सत्यनिष्ठापूर्वक सदाचरण सर्वोपरि--साधन है..!!!

Tuesday, February 15, 2011

Bhajan--Ganga...!

जागो दुनियाँ वालो और जानो सत्य नाम ,
बिना नाम जाने न होगा कल्याण ||

आयाथा दुनियाँ मे नाम जपने को ,
जपने लगा है झुठी माया ठगनी को |
ठगनी ने तुम को बनाया गुलाम ||बिना नाम .........

रामायाण गीता कि है सत्य वाणी ,
बिना नाम सुमिरण न तरसकता प्राणी |
नाम मे समाया है सारा बर्हमान्ड ||बिना नाम .............

आदी नाम न जाने अभिमानी प्राणी ,
आदी नाम जानी बनी मिरा दिवानी |
सुर ,तुल्सी ,कबिरा और जाने हनुमान ||बिना नाम .....


राम नाम सब के हि घट् मे हि समाया ,
लगा ढोंग बाजी मे प्रभु को भुलाया |
ढुडें न हिर्दय मे ढुडें सारा जाहाना ||बिना नाम ........

आये जगाने हमे त्रेता के राम जि ,
द्वापर के श्री कृष्ण मोहन घनस्याम जि |
श्री सद गुरु जि का एही है एलान् ||

सत्य "एक " है......!

एकं सत्या विप्रा वहुधा बदंति...!
सत्य "एक " है..जिसे ज्ञानी..महान--पुरुषो ने भिन्न--भिन्न नामो से वर्णित किया..!
सत्य एक इसलिए है..क्योकि यह अपरिवर्तनीय है..सनातन है .. नित्य नै..शाश्वत है......!
जैसे सूरज का प्रकाश नहीं बदलता..हवा और पानी भी अपनी प्राकृत नहीं बदलते..वैसे ही एक ही सनातन तत्त्व..सृष्टि के कण--कण में ओत--प्रोत है...!
..यह एक ऐसा स्पंदन है...जो जानने में सरल और साधने में दुष्कर है..!
कोई इसे "राम " कहता है..क्योकि यह सबमे रमण करनेवाला है..तो कोई इसको "विष्णु: कहता है..क्योकि यह विश्व के अनु--अनु में व्याप्त है..तो कोई इसको "कृष्ण" कहता है..क्योकि यह सबको आकर्षित करता है..!
कोई इसको " शिव " कहता है..क्योकि यह सबका कल्याण कनेवाला है..तो कोई इसको "ॐ" कहता है..क्योकि यह संपूर्ण चराचर जगत को उत्पन्न..पालन और संहार करनेवाला है..!
कोई इसको "GOD" कहता है..क्योकि यह..GENERATOR>>OPERATOR और DESTROYER है..!
कोई इसको "खुदा" कहता है..क्योकि यह खुद (अपने) में ही है..और खुद से ही निकालता है..! कोई इसको "अल्लाह" कहता है..क्योकि यह सबका आला ..अर्थात..सर्वशक्तिमान है.. !
कोई इसको "वाहेगुरु" कहता है..क्योकि यह गुरुओ का भी गुरु है..!तो कोई इसको "चांदना" कहता है..कोई "परम-परकाश" कहता है..कोई "नूर-ए-इलाही" कहता है..
तो कोई इसे "LIGHT" कहता है..!
..यह सभी नाम एक ही सत्य..(सनातन तत्त्व ) के गुणवाचक नाम है..!
बस्तु एक है..नाम अनेक है..!
तभी तो संत तुलसीदासजी कहते है......
....सियाराममय सब जग जानी..करहु प्रणाम जोरि जुग पानी...!!
...तो हमें इस सर्वव्यापक--परमात्मा जो संपूर्ण विश्व के अनु--अनु में ओत--प्रोत है..
को समय के तत्वदर्शी महान-पुरुष के सानिध्य में आकर सच्चे नाम से जानने और उसका साधन करना चाहिए..!

Monday, February 14, 2011

जीवन की महानतम उपलब्धि ....!!

जर्रे--जर्रे में रमण करने वाला परमात्मा का जो पावन--नाम है..यदि उसको परम--सौभाग्य से समय के तत्वदर्शी महान--पुरुष के सानिध्य में आकर हमने जान लिया है..
तो यह हमारे जीवन की यह महानतम उपलब्धि है..!!
हम जानते है..की जब तक हमें किसी बस्तु का नाम नहीं मालूम होगा ..तब तक हम उसके रूप को जान नहीं सकते है..इसलिए हर बस्तु का नाम और उसका रूप साथ लगा रहता है..!
इसीप्रकार जब हमें परमात्मा के पवन नाम का ज्ञान हो गया है..तब उनके रूप को हम सहज में ही जान सकते है..!
जैसे मेहदी के पीछे उसकी लालिमा (रूप) छिपी है..वैसे ही नाम के पीछे नूर छिपा है..!!
संत तुलसीदासजी कहते है...
"नाम-रूप-गुण अकथ कहानी..समुझत सुखद न परत बखानी..!"
रथात....प्रभु जी के पावन-नाम और उनके रूप के गुणों का वर्णन नहीं हो सकता..यह समझाने में ही सुखद है..और वर्णनातीत है..!!
इसलिए परमात्मा का नाम और रूप सुखद अनुभूति का विषय है..!
..धन्य है वह भक्त - गन जो निरंतर नांस-सुमिरन में लगे रहते है..!!

Sunday, February 13, 2011

जिस दिन मौत कि सहजादि आयेगि ,....!!


सज -धज के जिस दिन मौत कि सहजादि आयेगि ,
न सोना काम आयेगा न चांदी आयेगि ||

छोटा सा तु कितने बडे अरमान है तेरे ,
मिट्टिका तु सब सोने के समान है तेरे |
...मिट्टी कि काया जिस दिन मिट्टी मे समायेगि |
न सोना काम आयेगा ...............

पक्षि है तु पर पिंजडा खोल के उड जा '
माया मोह के सारे वन्धन तोड के उड जा ||
दिल कि धडकन मे जिस दिन मौत गुन-गुनायेगि ||
न सोना काम आयेगा .....................

अछा किया करम तुने पाया है मानव तन ,
अब पाप मे डुबा है क्यों मुरख तेरा मन |
यह पाप कि नैया तुझे एक दिन डुबायेगि ||
न सोना काम आयेगा ...............

धन दौलत से खाली होंगे एक दिन हाथ ,
अन्त समय भगवान का भजन चलेगा साथ |
सद गुरु हंस कि वाणी उस् दिन काम आयेगि ||
न सोना काम आयेगा न चांदी आयेगि ||

हरदम लौ कगता जा...

हरदम लौ कगता जा...
'अगर है शौक मिलाने का तो हरदम लौ कगता जा...
पकड़कर इश्क की झाड़ू ..सफाकर दिल के हजारे को..
दुई की धुल रख सर पे..मुसल्ले पर उडाता जा..!
न रख रोजा न मर भूखा..न जा मस्जिद न कर सिजदा..
वजू का छोड़ दे कुजा.... शराबे शौक पीता जा..!!
यह धागा तोड़ दे तस्दीक..किताबे ड़ाल पानी में..
मशायक बन के क्या करना..मशीकत को जलाता जा..!!
प्याला माय्खुदी का छोड़..प्याला बेखुदी का पी..
नशे में सैर कर प्यारे..तू-ही-तू गीत गाता जा..!!
खुदा तुम दूर मत समझो ..यही रास्ता है मस्तो का..
खुदी को दूर कर दिल से ..उसी के पास आता जा..!!
न हो मुल्ला न हो ब्रह्मण ..दुई की छोड़ दे पूजा..
हुक्म है शाह कलंदर का..तशाब्बुर को मिटाता जा..!!
कहे मंसूर काजी से ..निवाला कुफ्र का मत खा..
अनलहक नाम वराहक है..यही कलमा सुनाता जा..!!"

Saturday, February 12, 2011

सत्य-प्रीति और समर्पण

सीता का श्रीराम के प्रति नैसर्गिक प्रेम...!
रामचरितमानस में संत तुलसीदासजी कहते है...
"प्रभुहि चितई पुनि चितई माहि..राजत लोचन लोल..!
खेलत मनसिज मीन जुग..जणू विधि मंडल दोल..!!
गिरा नयन मुख पंकज रोकी ..प्रगट न लाज निसा अवलोकी..!
लोचन जल रह लोचन कोना..जैसे परम कृपिन कर सोना..!
सकुची व्याकुलता बढ़ी जानी..धरि धीरज प्रतीति उर आनी..!
तनु०मनु-बचनु मोर प्रनु साँचा..रघुपति-पद-सरोज चितु रांचा..!
तो भगवान सकल उर वासी..करिहहि मोहि रघुवर के दासी..!
जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू..सो तेहि मिलहि न कछु संदेहू..!
प्रभु तन चितई प्रेम प्रनु ठाना..कृपानिधान राम सबु जाना..!
सियहि विलोकि तकेहू धनु कैसे..गरुण परम लघु वयालाही जैसे..!
....रामायण कि इन चौपाइयो का सार तवा यह है..कि . जिसका जिस पर सत्य--प्रेम होता है..उसको वह मिलने में कोई संदेह नहीं है !
इसलिए हर प्रभु-प्रेमी भक्त को प्रभुजी के श्री-चरणों में सत्य-प्रीति और समर्पण रखना चाहिए..!

"मंजिल" कि प्राप्ति...!

"मंजिल" कि प्राप्ति...!
........"हर सुबहा निअकलाते है..हर शाम को ढलते है..
सूरज की तरहा हमारे अंदाज बदलते है...
शयेद किसी राही को साए कि जरुरत हो.....?
इस वास्ते यारो..! हम धुप में चलते है...हम धुप में चलते है..!
नज़ारे न उठाना तुम अंदेशा-ए-तूफ़ान है..
मौजो कि तरहा..दिल के जज्वात मचलते है....जज्वात मचलते है..!!
चहरे पे तगय्यर का एहसाह नहीं हमको...
हम जव भी बदलते है..आइना--ए--बदलते है..आइना--ए--बदलते है...!!
मंजिल ने "हयात" उसकी ख़ुद बढ़ के कदम चूमे..
" मंजिल" का यकीन लेकर जो घर से निकलते है..जो घर से निकलते है...!
हर सुबहा निकलते है हर शाम को ढलते है..
सूरज की तरहा हमारे अंदाज बदलते है..अंदाल बदलते है...!!

मानव शरीर की प्राप्ति....

मानव शरीर की प्राप्ति से ही हमें प्रभु के इस साकार लोक में आने का परम-सौभाग्य प्राप्त हुआ है..और इसप्रकार हमें पहली मुक्ति "सालोक्य" मुक्ति प्राप्त हुई है !
..इस स्थूल शरीर (पिंड) में कुल थीं संसार है..स्थूल...सुक्ष्म और कारण..!
हाड..मांस और रक्त से बना हुआ जो ढांचा है..वह स्थूल पिंड है..!
इसमे जो चेतना (मन) है..वह सुक्ष्म आत्मा है..जो त्रिस्तरीय..मन..बुद्धि और अहंकार में समाई हुई है..! यहि संकल्प--विकल्प में पड़ी रहती है..!
..इस सुक्ष्म चेतना के अति--चेतन्य स्थिति में होने पर हम जिस लोक में पहुचाते है..वह "कारण" कहलाता है..! जहां पर जीव जब एक बार पहुँच जाता है तो उसकी सद्गति हो जाती है..क्योकि तब वह प्रामा--प्रभु के लोक और गोद में जा पहुचता है..! यही स्थान छीर-सागर के नाम से जाना जाता है.जहां पर लक्षी-नारायण विराजमान है..!
....धन्य है..हम सभी मानव...जिन्हें यह देव-दुर्लभ मनुष्य शारीर परम-प्रभु की अहेतु की कृपा से प्राप्त हुआ है..और चौरासी-लाख योनियों से त्रसित होने के पश्चात यह "सालोक्य" मुक्ति प्राप्त हुयी है..! इसकी इतनी बड़ी महिमा है..जिसे कहा नहीं जा सकता..! लेकिन मानव का यह दुर्भाग्य है..कि वह इसकी यथार्थ--स्थिति से पूर्णतः अनजान है..!

Friday, February 11, 2011

रामायण--सार..!

रामचरितमानस में गुरु वशिष्ठ जी भारत से कहते है...
"सुनहु भारत भावी प्रवल बिलखी कहेहु मुनि नाथ..!
हानि--लाभ जीवन--मरनु जसु--अपजसु बिधि हाथ..!!"
अर्थात..राम--वन--गमन के पश्चात जब भारत ननिहाल से अयोध्या लौटते है..तब बिलखते हुए वशिष्ठ मुनि जी कहते है.." हे भारत..! सुनो..हानि लाभ जीवन मरण यश और अपयश..यह छ चीजे विधाता के हाथ में है..! इस पर मनुष्य का कोई वश नहीं है..!
...सम्पूर्ण रामायण इसी छ चीजो के इर्द--गिर्द चलते हुए मुखरित होती है..!!
बिचारिये.."हानि" किसकी हुयी..?
हानि अयोध्या वासियों कि हुयी जो उनको प्रभु श्रीराम का बियोग मिला..!
"लाभ" किसका हुआ..?
लाभ वन--वासियों और केवट का हुआ..जिन्होंने प्रभु श्रीराम के दर्शन पाए और सेवा की..!
"जीवन" किसको मिला..?
जीवन ऋषि--मुनियों को मिला..जिन्हें राक्षसों से भगवान श्रीराम ने बचाया और उन्हें अभय-दान दिया..!
"मरण" किसका हुआ..?
मरण रजा दशाताय्ज का हुआ..जिन्होंने प्रभु श्री राम जैसे पुत्र के विछोह में अपने प्राण त्याग दिए..!
"यश" किसका हुआ..?
यश भालु--बंदरो का हुआ जिन्होंने प्रभु श्रीराम के साथ राक्षसों से युद्ध किया और विजय पाई..!
"अपयश" किसका हुआ..?
अपयश कैकेयी का हुआ..जिन्होंने जिन्होंने प्रभु श्री राम कोरज गद्दी पर बैठने नहीं दिया और रजा दशरथ की मृत्यु का बनी..!
...स्यष्ट है..यह सभी चीजे बिधाता की इच्छा पर थी..और सम्पूर्ण रामायण का यही सार--तत्त्व है..!
..मानव-जीवन में भी यह सभी चीजे घटित होती है..किन्तु भ्रम-वश मनुष्य इसकी वास्तविकता और इसके पीछे दैवी-शक्ति का संज्ञान नहीं ले पाटा..!
..आवश्यकता है यथार्थ को जानने-समझाने की..!
..प्रभु की इच्छा से ही सभी कर्म उत्पन्न होते है..और इसकी पूर्ति भी प्रभु की इच्छा से ही होती है..१
मनुष्य तो केवल निमित्त-मात्र है..!

रामचरितमानस" क्या है..?

"रामचरितमानस" क्या है..?
यह कलियुग का "सामवेद" है.!.
कुल चार वेद है....ऋग्वेद..अथर्व वेद..यजुर्वेद..सामवेद..!
प्रत्येक वेद में " योग" की चारो भुजाओं में धारित क्रमशः..शंख..चक्र..पद्म..गदा..के तात्विक गुणों की तत्वतः व्याख्या और विवेचना की गयी है..!
ऋग्वेद में सुदर्शन--चक्र अर्थात..ज्योति--ब्रह्म...अथर्ववेद में शंख अर्थात..नाद--ब्रह्म...सामवेद में गदा अर्थात..शब्द--ब्रह्म और यजुर्वेद में पद्म अर्थात..अमृत की विषद--रूप से तत्वतः विवेचना की गयी है..!
इसप्रकार रामचरितमानस सामवेद अर्थात..भगवान् योगेश्वर के हाथ में "गदा" (शब्द--ब्रह्न)
के सादृश्य फल देनेवाला है..!
जो इसको पढता--सुनाता--मनन करता है..वह भव--सागर से पार उतर जाता है..!
यह तीन डंडो वाली नसैनी(सीढ़ी) है..सबसे निचले डंडे पर.".मानस अर्थात..मन" है..बिच के डंडे पर "चरित्र " अर्थात चरित्र है..और सबसे ऊपर के डंडे पर "राम" अर्थात साक्षात् मर्यादा--पुरुषोत्तम भगवान श्री राम विराजमान है,,!
अर्थात..इसको निर्मल मन से और सात्विक चरित्र से यदि गया--पढ़ा और मनन किया जाय तो ततछन ही भगवान् र्श्रीराम्चान्द्रजी के दर्शन सुगमता से प्राप्त हो जायेगे..!
तभी तो भगवान श्रीरामचंद्रजी कहते है...
"निर्मल--मन--जन मोहि पावा..मोहि कपट--छल--छिद्र न भावा..!!"
जाते बेगि द्रवहु मै भाई. .सो मम भगति भगत सुखदायी..!!"
उक्त दोनों ही चौपइयो का अर्थ स्पष्ट है..परमात्मा को पाना है तो निरला मन के साथ छल--कपट छोड़ कर भक्ति--भाव से भजन करना चाहिए..!!
आगे फिर गिस्वामीजी कहते है..
" भक्ति सुतंत्र सकल गुण खानी..बिनु सत्संग न पावहि प्राणी.."
अर्थात..तह भक्ति हर मानव में एक सर्वथा स्वतन्त्र गुण है..जो सभी गुणों की खान है..और जिसे बिना सत्संग के प्राणिमात्र द्वारा प्राप्त नहीं क्या जा सकता है..!
"सत्संगति किम न करोति पुन्षाम ".. अर्थ सवतः स्पष्ट है..!
तभी तो कहा है.."बड़े भाग पाईये सतसंगा..बिनाहि प्रयास होइ भव--भंगा..!
बिनु सत्संग विवेक न होइ..राम--क्रपा बिनु सुलभ न सोई..!!"
अर्थात..सौभाग्य से ही सत्संग मिलाता है..सत्संग से बिना प्रयास किये ही संसारिकता से मुक्ति मिलती है..बिना सत्संग से विवेक जाग्रत नहीं होता और सत्संग भी प्रभु श्र्रम की कृपा के बगैर सुलभ नहीं होता..!!
...एक घडी..आधी घडी..आधी ते पुनि आध..तुलसी संगति साधू की कटे कोटि अपराध !..अर्थात..निमित्त--मात्र के समय के लिए भी यदि संत--पुरुषो की संगति प्राप्त हो गयी..तो भी..कोटि अपराध (पाप) भी दग्ध हो जाते है..!!
..संत मिलन को चाहिए तजि माया अभिमान..ज्यो-ज्यो पग आगे बढे कोटिक जग्य सामान..!! अर्थात..माया--अभिमान से रहित होकर संत--पुरुषो से मिलाना चाहिए..मिलने जाने में जैसे--जैसे पग (कदम) आगे बढ़ता है तैसे--तैसे कोटि यज्ञो के बराबर का फल मिलाता जाता है..!
..इसप्रकार अपना कल्याण चाहने वालो सत्पुरुषो को निरंतर सत्संग करना चाहिए..यही सन्देश है..!

Thursday, February 10, 2011

"सन्मार्ग" क्या है..?? What is "TRUE PATH" ?

"सन्मार्ग" क्या है..?? What is "TRUE PATH" ?
महाभारत काल में युधिष्ठिर जब वनवास में थे..तब..यक्ष ने उनसे यह प्रश्न पूछा...!
युधिष्ठिर ने जबाब दिया...."महाजनों येन गता सः पन्थाः "
..अर्थात..जिस मार्ग पर महान--पुरुष चले..वह सन्मार्ग है..!
तो बिचार करने की बात है..हमारे महान--पुरुष किस मार्ग पर चले..??
उन्होंने कहा.."असतो माँ सत गमय.."..मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो..!
"तमसो माँ ज्योतिर्गमय..?..मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो..!
"मृत्योर्मामृत गमय.."..मुझे मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो..!
स्पष्ट है...हमारा लक्ष्य असत्य की ओर जाने का होना चाहिए..! से सत्य की ओर..अन्धकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर जाने का होना चाहिए..!
..लेकी आज का मानव किधर जा राहा है..??
..मनुष्य के अन्दर जो कुप्रवृत्तिय है..उसके पीछे कौन से कारण है..??
इसके पीछे अज्ञानान्धकार..तमोगुनो की प्रधानता और माया--मोह की प्रवलता है..!
रामचरितमानस में गोस्वामीजी कहते है...
" मोह सकल व्याधिंह कर मुला...जेहि ते पुनि उपजहि बाहु शूला..!"
अर्थात..माया--मोह..(ILLUSION_..ही प्रबल कारण है..जिससे अज्ञान ..काम--क्रोध--लोभ--मोह --अहंकार..जैसे तमोगुण उत्पन्न हो रहे है..!
जब तक ज्ञान--रूपी प्रकाश नहीं मिलेगा..तब तक यह अन्धकार दूर नहीं हो सकता ..!
जिसे अपने--आप को पाने--जानने की अभलाषा--इच्छा होती है वह इस मार्ग पर चल पड़ता है..!
गोस्वामीजी आगे कहते है..
"अति हरी कृपा जाहि पर होई..पाँव देहि यह मार्ग सोई..!"
..तो सत्गुनो का प्रगटीकरण और उसकी प्राप्ति परमात्मा की कृपा से ही होती है..!
जब प्रभु की कृपा से ग्यानी आत्मा का सानिध्य प्राप्त होता है..तब आत्मा जागृति होती है..! नानकदेवजी कहते है..
" जागो रे जिन जागना..अब जागन की बारी..फिर क्या जागे नानका जब सोये पाँव पसारी !"
अर्थात..जिनको जगाना होता है..वह अपने जागने की राह देख लेते है..और जिन्हें पाँव--पसार कर सोना होते है वह सोते ही रह जाते है..!
इसप्रकार माया--मोह में सोये हुए को जगानेवाला समय का तत्वदर्शी महान--पुरुष हर काल--हर समय--हर जगह विद्यमान रहता है..!
आवश्यकता है..उनको जानने--समझाने--पहचानने की..तभी इस विकट अज्ञानता से मुक्ति मिल सकती है..!


काम--क्रोध अरु लोभ..!

रामचरित मानस में गोस्वामीजी कहते है...
"तात तीनि अति प्रवाल खल..काम--क्रोध अरु लोभ..!
मुनि--विज्ञान--धाम--मन करहु निमिष महू छोभ....!!

लोभ के इच्छा--दंभ--बल..काम के केवल नारि..!
क्रोध के परुष बचन बल..मुनिवर कहहि बीचारि..!!""

..अर्थात..काम,,क्रोध और लोभ..यह मनुष्य के तीन प्रबल शत्रु है..जो मुनि और ज्ञानी पुरुषो के  मन में निमिष--मात्र के लिए छोभ उत्पन्न कर देते है..!
लालसा--दंभ से लोभ को बल मिलाता है..कमनीय--नारी से काम को बल मिलाता है..जबकि कटु--बचन से क्रोध को बल मिलाता है....ऐसा ऋषि--मुनि लोग बिचार कर कहते है..!!
....आध्यात्मिक--जीवन की यात्रा में एक सच्चा--साधक इन तीनो प्रवाल--शत्रुओ पर अपनी योग--साधना और गुरु--कृपा से विजय प्राप्त कर लेता है....नित्य--प्रति की तपश्चर्या व् योग--साधना से उसमे इतना आत्म--संयम व् चिर--विश्रांति उत्पन्न हो जाती है कि इन प्रवाल--शत्रुओ का उसके तन--मन पर कोई असर नहीं पड़ता..!!
..जब--तक जिह्वा बाहर लप--लप करती रहेगी.इस दुर्गम .संसार--सागर में जीव डूबता रहेगा..गुरु-कृपा और ताप-साधना से जैसे ही जिह्वा अन्दर की ओर स्वाभाविक--रूप में प्रवेश कर जाएगी..जीव की गति अंतर्मुखी होती चली जाएगी..!!
..अतः..अपना कल्याण चाहनेवाले धर्मात्मा--पुरुष सदैव साधनारत रहते है..!!

Wednesday, February 9, 2011

आप जपे औरो को जपाये..नानक निश्चय मुक्ति पाए...

आप जपे  औरो  को जपाये..नानक  निश्चय  मुक्ति  पाए...
कहता  हु..कहे जात  हु..कहू  बजा  के ढोल ..
स्वांसा खाली  जाय  है..तीन  लोक  के  मोल..!
ऐसे  महगे  मोल  का  जो  एक  स्वांश  भी  जय..?
चौदह  लोक  न  पतातारे  काहे  धुरि  मिलाय..??

स्वांस-स्वांस  सुमिरो  गोविन्द   बृथा  स्वांस  मत  खोय..........!!!!

भजन-गंगा में गोता लगाइए......

भजन-गंगा में गोता लगाइए......

झीनी रे झीनी बीनी चदरिया...!
काहे को धागा और काहे को भरनी..कवन तार से बीनी चदरिया..??
इगला-पिगला तागा-भरनी....सुखमय तार से बीनी चदरिया..!
साईं को बुनत मॉस--दस लागे....ठोक--ठोक के बीनी चदरिया..!
आठ कमल--दल चरखा डोले....पांच--तत्त्व तीन--गुनी चदरिया....!!
सोई चादर सुर--नर--मुनि ओढे...ओढ़ के मैली कीन्ही चदरिया..!
ध्रुव ओढ़ी प्रहलाद ने ओढ़ी..शुकदेव पावन कीन्ही चदरिया..!!
दास कबीर जातां से ओढ़ी...जस-की-तस रख दीन्ही चदरिया....!!
.....झीनी रे झीनी बीनी चदरिया..............!!

Tuesday, February 8, 2011

कथनी मीठी खाड़-सी करनी विष-सी होय....!

कथनी मीठी खाड़-सी  करनी विष-सी होय....! 
कथनी छोड़ करनी करे विष से अमृत होय..!!.....तो भाई..साधना कथनी का नही ..बलिक करनी का विषय है..! कहने--सुनाने में इसमें मिठास है..लेकिन करने में इसमें जहर--पीने जैसी तकलीफ है..! जो कथनी छोड़ कर चुप--चाप करनी अर्थात..तत्त्व--साधना करते है वह इस जहर को अमृत--तुल्य बना देते है..!!
..इसलिए एक सच्चे साधक को सदैवे अंतर्मुखी होकर आत्म--तत्त्व की साधना करनी चाहिए..! गुरु--कृपा से यह साधना फलीभूत होते ही इससे प्रस्फुटित होने वाला ज्ञान--रूपी प्रकाश स्वतः ही मुखरित होने लगता है..! धन्य है वह भक्त..जिसे यह गुरु--कृपा सहज में ही सुलभ है..!!

परमात्मा का वह कौन सा नाम है ..जो सदैव विद्यमान रहता है...!

"...बिचार करने की बात है..की परमात्मा का वह कौन सा नाम है ..जो सदैव विद्यमान रहता है तथा जिसका स्पंदन जर्रे--जर्रे में विद्यमान है..! प्रत्येक बस्तु का नाम तथा स्वरूप साथ रहते है ! परमात्मा का नाम तथा स्वरूप भी एक साथ है..! वाही नाम अग्नि,,सिराज तथा चन्द्रमा का कारण है और आकाश और पृथ्वी का नियंता है..! उसी की शक्ति प्राणी--मात्र को जीवित और क्रियाशील रखती है तथा शारीर से उसके निकल जाने के पश्चात प्राणी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है..!यह शक्ति सत..चेतन तथा आनंदस्वरूप है..ऐसे अमूल्य कोष के ह्रदय में रहते हुए हम अज्ञान के कारण शांति तथा आनंद से बंचित है..!इसलिए मनुष्य शारीर के रहते हमें इस शक्ति का बोध अवश्य प्राप्त कर लेना चाहिए..!!"---सदगुरुदेव श्री सतपाल जी महाराज ...!

"धर्म से अधि व्यापक तत्त्व संसार में और दूसरा नहीं है..

"धर्म  से  अधि व्यापक  तत्त्व  संसार  में  और  दूसरा  नहीं  है..लेकिन  धर्मं  ने मानव  को  कितनी  कितनी  संकुचित  सीमाओं  में  बाँध  दिया  है ! धर्मं  का सम्बन्ध  मानव  के  शरीर  से  नहीं  ,,बल्कि  चेतना (आत्मा) से  है..बौद्धिकता  से  नहीं..बल्कि  ह्रदय  से है..हिन्दू  या  मुसलमान  से  नहीं..बल्कि  मानव  से  है....!!"------सदगुरुदेव  श्री  सतपाल जी महाराज..

Monday, February 7, 2011

"ॐ" क्या है..?

"ॐ" क्या है..?
..जैसा कि मुह से इस शब्द को उच्चारित करते समय हमें अनुभव होता है.....कुल तीन अक्षर इसमें मिलते है..अ..उ..म..अर्थात..अकार..उकार..मकार..!
"अ" ह्रदय से मध्यमा--वाणी से .."उ" कंठ से पश्यन्ति वाणी से ..और "म" जिह्वा से बखरी वाणी से उच्चारित होकर निकलती है..!
इसप्रकार इन तीनो वाणियो को हम "अपरा" वाणी कहते है..जिसमे मानव--शरीर के तीन अंग..ह्रदय..कंठ..जिह्वा का संयोग--संगम होता है..अतः यह "जूठा" हो जाता है..!
इस "ॐ" अक्षर के ऊपर जो बिन्दु है..उसका हम उच्चारण नहीं कर पाते और न ही सामान्यतः इसका अर्थ कोई जनता है..यह..निर्लिप्त है और सबका साक्षी है..अ-उ-म में जुडा हुआ है फिर भी अलग--थलग सा है..! यही एक रहस्य है..!!
अ+उ+ म से तात्पर्य..कमशः ब्रह्मा..विष्णु..महेश से है..जो "परा--शक्ति" माँ गायत्री के तीन पाद है..!
"ॐ" के ऊपर जो बिन्दु है..वह "एकाक्षर" ब्रह्म का प्रतीक है..जो सबमे समाया हुआ है..
और जो एक कल्प में ब्रह्मा..विष्णु..महेश को उत्पन्न कर देने के बाद भी शेष रहता है..वह ही सब बीजो का बीज परम--पिटा-- परमात्मा का प्रतीक स्वरूप अंकित किया जाने वाला "बिन्दु" है..!
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी कहते है...
"शिव--बिरंच--विष्णु भगवाना उपजहि जासु अंश ते नाना..!
ऐसेही प्रभु सेवक बस अहही..भगत हेतु लीला तन गहही..!!"
अर्थात ...ब्रह्मा-विष्णु--महेश सहित तमाम जिसके अंश से उत्पन्न होते है..वाही पर--ब्रह्म परमेह्स्वर भक्तो कि रक्षा हेतु लीला का शरीर धारण करते है और सेवा के बस में रहते है..!!
..इसप्रकार यह स्पष्ट है..कि जन--सामान्य को परमात्मा के सर्व--व्यापक नाम का ज्ञान नहीं है..और जो भी नाम उच्चारित करते है..वह सब अपरा--वाणी से बोली जाती है..जो बोलते है समाप्त हो जाती है..इसका "आदि " और "अंत" दोनों ही होता है..जबकि "परा-वाणी" जीव के प्राणों का विषय है..जो सब बीजो का बीज परमात्मा का पावन--नाम है और जिसका ज्ञान समय के तत्वदर्शी महान पुरुष से प्राप्त होता है.. !!
...यह मानव का ही सौभाग्य है..कि वह इसको प्राप्त करके अपना कल्याण कर सकता है..! सत्य ही कहा है...
"राम--राम" सब कोई कगे नाम न चीन्हे कोय..!
नाम चीन्हे सदगुरु मिले भेद बतावे सोय..!!"

Sunday, February 6, 2011

मन मथुरा दिल द्वारिका काया काशी.......!

मन मथुरा दिल द्वारिका काया काशी जान..दसवां द्वारा देहरा तामे ज्योति पहचान..!
..अर्थात..यह मन ही मथुरा है जहां क्रूर राजा कंस विराजते है..दिल ही द्वारिका है..जहां मुरली--मनोहर--गोपी--कृष्णजी विराजते है..मानव शरीर ही काशी है..जहां शिवजी की कृपा से मुक्ति मिलाती है...इस मानव--काया में दसवां--द्वार..यानी तीसरी आँख ही वह दलहीज है जहां हम अपनी जीवन--ज्योति को देख--पहचान--जान सकते है..!!
..कहने का तात्पर्य यह है कि...यह मानव--तन बहुत कीमती है..जिसमे मन बेलगाम घोड़े की तरह है..ह्रदय बहुत कोमल है क्योकि वहा पर सत्य--नारायण--परमात्मा का निवास है..यह शरीर ही मुक्ति प्राप्त करने का साधन है ..और "आज्ञा--चक्र" (उपनयन) ही ज्योति--स्वरूप परमात्मा को देखने--पहचानने की दलहीज (दरवाजा) है..!
..धन्य है हम सब भक्त--गण जिन्हें यह दुर्लभ मानव--तन प्रभु की अहेतु की कृपा से मिला है..हमें निरंतर भजन--सुमिरन करना चाहिए..!!

RELIGION IS REALIZATION..!

 
  • SWAMI  VIVEKANAND....

    First, feel from the heart. What is in the intellect or reason? It goes a few steps and there it stops. But through the heart comes inspiration. Love opens the most impossible gates; love is the gate to all the secrets of the universe....

    Expand your hearts and hopes, as wide as the world. Deep as the ocean, broad as the infinite skies, that is the sort of heart we want.

    Work Is Worship
    Power and things like that will come of their own. Put yourself to work, and you will find such tremendous power coming to you that you will feel it hard to bear. Even the least work done for others awakens the power within; even thinking the least good of others gradually instils in the heart the strength of a lion. I love you all ever so much, but I wish you all to die working for others....

    It is you only who are in this world lying prostrate today like inert matter. You have been hypnotised. From very old times, others have been telling you that you are weak, that you have no power, and you also, accepting that, have for about a thousand years gone on thinking, “We are wretched, we are good for nothing.” (Pointing to his own body) This body (of Vivekanand) also is born of the soil of your country; but I never thought like that.

    And hence you see how, through His will, even those who always think of us as low and weak, have done and are still doing me divine honour. If you can think that infinite power, infinite knowledge and indomitable energy lie within you, and if you can bring out that power, you also can become like me.

    An Equal Approach
    The essential thing is renunciation. Without renunciation, no one can pour out his whole heart in working for others. The man of renunciation sees all with an equal eye and devotes himself to the service of all. Doesn’t our Vedanta also teach us — himself to the service of all? Doesn’t our Vedanta also teach us to see all with an equal eye?

    Why then do you cherish the idea that your spouse and children are your own, more than others? At your very threshold, Narayana himself in the form of a poor beggar is dying of starvation! Instead of giving him anything, would you only satisfy the appetites of your family with delicacies?

    Set An Example
    Why not do as much as lies within your power? Even if you cannot give to others for want of money, surely you can at least breathe into their ears some good words or impart some good instruction. Or does that also require money?

    So work, my boys, work! The rough part of the work has been smoothened and rounded; now it will roll on better and better every year. Rejoice that you have done so much. When you feel gloomy, think what has been done within the last year. How, rising from nothing, we have the eyes of the world fixed upon us now. Not only India, but the world, is expecting great things of us.

    Are you sincere? Unselfish even unto death? And loving? Then fear not; not even death. Onwards, my lads! The whole world requires light. It is expectant! India alone has that light not in magic, mummery and charlatanism, but in the teaching of the glories of the spirit of real religion — of the highest spiritual truth.

    That is why the lord has preserved the race through all its vicissitudes unto the present day. Now the time has come. Have faith that you are all, my brave lads, born to do great things. Let not the barks of puppies frighten you — no, not even the thunderbolts of heaven — but stand up and work!

    Wake Up And Be A Servant

    Have fire and spread all over. Work, work. Be the servant while leading. Be unselfish, and never listen to one friend in private accusing another. Have infinite patience, and success is yours. I want that there should be no hypocrisy, no roguery.

    There shouldn’t be a breath of immorality, nor a stain of policy which is bad. No shilly-shally, no esoteric blackguardism, no secret humbug, nothing should be done in a corner. Onward, my brave boys — money or no money — men or no men! Have you love? Have you God? Onward and forward to the breach, you are irresistible. Take care! Beware of everything that is untrue; stick to truth and we shall succeed, maybe slowly, but surely. Work as if on each of you depended the whole work. Fifty centuries are looking on you, the future of India depends on you. Work on.

    There is success and failure in every work. But there is no salvation for a coward. In my eyes, this world is mere play — and it will always remain as such. Should one spend six long months brooding over the questions of honour and disgrace, gain and loss pertaining to this?

    O hero, awake, and dream no more.

ध्यान क्या है..?

चित्त-वृत्तियों का निरोध करके ध्येय वास्तु को अपनी चेतना में धारण करने और उसको



आज्ञा--चक्र में निर्लिप्त होकर देखना व् उसका चिंतन करना ही "ध्यान" है..!



आज्ञा--चक्र का ज्ञान गुरु की शरणागत होने पर ही प्राप्त होता है..!



इसलिए कहा है कि



"गुरु--बिनु होय कि ज्ञान ...ज्ञान कि होई विराग बिनु .. गावहि वेद--पुराण सुख कि लहहि हरि--भगति बिनु..!!"



अर्थात...बिना गुरु के आज्ञा--चक्र का ज्ञान नहीं होता..और बिना वैराग्य के ज्ञान भी नहीं होता..! इस कि महिमा वेद--पुरानो ने भली--भाति गई है..और कहा है कि बिना प्रभु की भक्ति किये सुख नहीं प्राप्त होता..!!



जब हम्मारे सत्कर्मो के पुण्य उदित होते है और प्रभु की कृपा होती है तब गुरूजी के दर्शन होते है..!..."जब गोविन्द कृपा करि..तब गुरु मिलिया आइ.."



गुरूजी.. की कृपा से हमें अष्टांग--योग का ज्ञान प्राप्त होता है..जो अध्यात्म की रीढ़ है..!





स्कन्द--पुराण में कहा गया है कि..

"ध्यान--मुलं गुरुमुर्तिः पूजा--मुलं गुरुपादुका मंत्र--मुलं गुरुवाक्यम मोक्षमुलम गुरुकृपा..!"

इसप्रकार ध्यान..पूजा..मंत्र और मोक्ष...इन चारो ही क्रियाओं में गुरूजी की महान--उपस्थिति है..! स्पष्ट है..गुरूजी की मूर्ति का ही ध्यान ..गुरूजी की पादुका की पूजा....गुरूजी द्वारा दिया गया शब्द ही मंत्र और गुरूजी की कृपा ही मुक्ति का कारक है..!!

..ॐ श्री सद्गुरुचरण A कमलेभ्यो नमः....!

Saturday, February 5, 2011

कर्म--अकर्म...पाप--पुण्य...!!

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी कहते है...
"..भले भलाइहि पे लहहि..लहहि निचाइहि नीचु...!
..सुधा सराइही अमरता गरल सराइही मीचु..!!
..अर्थात..भले लोग भलाई करने में और नीच लोग नीचता करने में लगे रहते है..
जैसे अम्रत की सराहना इसलिए होती है क्योकि इसके पिने से अमरत्व की प्राप्ति होती है..
वैसे ही विष की निंदा इस लिए होती है क्योकि इसके पान करने से मृत्यु हो जाती है..!
...इसप्रकार समाज में भले और बुरे लोग अमृत और विष की तरह है..!
..इसलिए कहा है...."..परोपकाराय सतां विभूतयः.."..अर्थात...परोपकार ही संत--पुरुषो का आभूषण है..!
मानस में आगे गोस्वामीजी कहते है..
"..परहित--सरिस धरम नहि भाई..पर--पीड़ा सम नहि अधमाई..!"
अर्थात..दूसरो की भलाई के समान कोई धर्मं नहीं है और दूसरो को त्रास या यंत्रणा देने के समान कोई अधर्म नहीं है..!
महर्षि वेदव्यासजी कहते है....
"...अश्थादास पुरानेशु व्यासस्य वचनं द्वयं ..परोपकाराय पुण्याय पापाय पर-पीडनं ..!!"
अर्थात..अट्ठारह पुराणों में व्यासजी के मात्र दो ही बचन है..परोपकार के समान कोई पुण्य नहीं है ..और पर--पीड़ा के समान कोई पाप नहीं है..!
..यहि सब कर्म--और--अकर्म की गति है..!
...महाभारत के युद्ध के समय कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अपने बंधू--बंधवो को मरने--मारने की इच्छा से सामने खड़ा देखकर अर्जुन को मोह उत्पन्न हुआ..तब..भगवान श्रीकृष्ण जी ने
ने अर्जुन को तत्त्व--ज्ञान का उपदेश दिया और समझाया कि.. इस मृत्यु--लोक में यहाँ न कोई किसी को मारता या मरवाता है..सब मेरी ही इच्छा से उत्पन्न हुआ कर्म है ..!
मात्र अपने धर्मं की रक्षा के लिए मानव--मात्र को अपना कर्त्तव्य कर्म करने का सिर्फ अवसर प्रदान करने वाला मै ही हू.. योग--माया में रहकर इस श्रृष्टि की रचना..उत्पत्ति
पालन और संहार करनेवाला मै ही हू..! तेरा मात्र क्षत्रिय धर्म की रक्षा करने के लिए
युद्ध--रूपी कर्म करने से ही प्रयोजन है इसके फल से नहीं..! जिन कुटुम्बियो के लिए तू मोहित हो रहा है..वह सब पहले से ही मर चुके है..! अपना वैश्वानर--रूप दिखाते हुए श्रीकृष्ण भगवान ने समझाया कि यह जीवात्मा अजर--अमर--अविनाशी है..! ऐसा कोई समय नहीं था..जब तू नहीं था या तू नहीं रहेगा..अथवा मै नहीं था या मै नहीं रहूगा..!
..भगवान श्रीकृष्णजी के तत्त्व--ज्ञान के उपदेश से अर्जुन का मोह दूर हुआ और भीषण संग्राम में उसकी विजयश्री प्राप्त हुई..!
...सारतः हम कह सकते है...माया--मोह से परे हटकर जिस कर्म को करने से आत्मा आह्लादित या प्रसन्न होती है..वह सब पुण्य कर्म है..और जिस कर्म के करने से आत्मा
त्रसित या ग्लानित होती है वह सब पाप--कर्म है..!
...कर्म--प्रधान विश्व करि राखा..जे जस कराही ते तस फल चाखा..!
..कराइ जो करम पाँव फल सोई..निगम-नीति अस कह साबू कोई..!!
..अनुचित--उचित काजु किछु होऊ..समझि करिय भाल कह सब कोऊ..!
..सहसा करि पाछे पछिताही..कहहि वेद बुध ते कछु नाही..!!
....तो कर्म--अकर्म की गति को उक्त पंक्तियों में गोस्वामीजी ने भलीभाति समझा दिया है !!

Friday, February 4, 2011

परमानंद

न समझने की ये बाते है. और .ना समझाने की....जिंदगी उचटी हुयी नींद है दीवाने की..!!
इस दीवानगी ने क्या--क्या करिश्मे दिखलाये है..?
अक्सर हम इस तरफ भी मुस्कराए है..!!
..अध्यात्म से हटाकर जो कुछ भी है वह सांसारिकता से जुदा होने के कारण अनुभूति से परे है. विशुद्ध रूप से निर्वैयक्तिक विषय है..!
...प्रभु के श्री- चरणों में दीवानगी की हद तक प्रेम हो तो कोई कारण नहीं कि हमको परमानंद की प्राप्ति न हो..!!
गोस्वामी तुलसीदास जी को अपनी पत्नी रत्नावली से बहुत प्रेम था..एक अवसर ऐसा आया कि वह उसका वियोग नहीं सह सके और अर्ध--रात्री को बरसाती नदी पार करके पत्नी के पास उसके मायके पहुँच गए..जिस--पर उनकी पत्नी ने धिक्कारते हुये उनको निम्न शब्दों में कहा...
लाज ना लागत आपको दौड़े आये साथ..धिक्--धिक् ऐसे प्रेम को कहाँ कहू मै नाथ..!
"अस्थि--चर्ममय देह मह तामे जैसी प्रीति..तैसी तो श्री--राम मह होति न तव भवभीति..!!
...बस इतना ही काफी था...और तुलसीदासजी उलटे--पाँव लौट पड़े.. फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा..और प्रभु श्री रामचन्द्रजी का गुणगान करते हुये भवसागर से पार हो गए..!!

सत्य--सार

चार  राम  है  जगत  में  तीन  राम  व्यवहार..!
एक  राम  सत्य--सार  है  उसका  करो  विचार..!!

प्रथमो  शालिग्राम..दूजो  पारस राम..तीजो  राजाराम..!
चतुर्थो  आतमराम....आतमराम...!!


..तो  सबकी  आत्मा  में  रमण  करने  वाला  जो  प्रभु  का  नाम  है..वही  सत्य--सार  है..और  उसी  का  हमें  चिंतन --सुमिरन   करना  चाहिए..!!

यागः कर्माशु कौशलम....कर्म में कुशलता ही योग है..!

यागः कर्माशु कौशलम....कर्म में कुशलता ही योग है..!
जब तक हम अपनी चेतना (मन) को किसी कार्य के निष्पादन के लिए एकाग्र नहीं करेगे तब तक जम कार्य को करने में असमर्थ रहेगे !
इसप्रकार चेतना (ज्ञानेन्द्रिय) और कार्य (कर्मेन्द्रिय) का योग ही कर्म में कुशलता और सफलता प्रदान करता है..!
इन दोनों का मेल कल्याणकारी है..!
हम जानते है..कि हर मांगलिक कार्य को प्रारम्भ करने से पहले श्री गणेश जी की पूजा--अर्चना कि जाती है...क्यों..??
क्योकि गणेश जी का सूंड पानी पिने और सूंघने..दोनों के ही काम आता है.. पानी पीना कर्मेन्द्रिय और सुंधना ज्ञानेन्द्रिय का विषय है..और इन दोनों का योग कार्य में सफलता प्रदान करने वाला है..!
इसके अतिरिक्त श्री गणेश जी प्रभु के शाश्वत नाम के प्रभाव को जाननेवाले पहले देव है..इसलिए हर मांगलिक कार्य में श्री गणेश जी कि पूजा करने आ आशय प्रभु के नाम के प्रभाव को महिमामण्डित करना है..!
हमारी चेतना के तीन स्तर है..प्रथमतः..मन..फिर इससे सुक्ष्म बुद्धि..और इससे सूक्ष्मतम अहंकार..! यह तीनो ही अदृष्य रूप में है..और सिर्फ अनुभव में आते है..!
इसका प्राकट्य व्यक्ति के कार्य..आचरण..व्यवहार..और विचार--अभिव्यक्ति से होता है..!
जब मन कि गति रुक जाती है और संकल्प--विकल्प करनेवाली बुद्धि समर्पण करके अपने व्यक्तिगत स्थिति (अहंकार) को भूल जाती है..तब चेतना कि इस निर्मल अवस्था में व्यक्ति के अन्दर के सभी दैविक गुण स्वतः प्रकट होने लगते है..!!
जैसे मटमैले पानी से बहरे बर्तन को हम शांत अवस्था में रख दे तो शनै--शनै उसमे घुली मिटटी या गन्दगी नीचे बैठ जाती है..और स्वच्छ--जल पारदर्शी--रूप में ऊपर आ जाता है..!
ऐसे ही जब हम अपने मन को एकाग्र करके सत्संग का श्रवण करते है..तब हमारे
अन्दर बैठे सभी तमो--गुण ..काम--क्रोध--लोभ--मोह--मत्सर..निष्प्रभावी होने लगते है..!
निरंतर सत्संग श्रवण से यह बिलकुल ही नष्ट--प्राय हो जाते है..दब जाते है..क्योकि तब सतोगुण ..सत्य--अहिंसा--असते--ब्रह्मचर्य--अपरिग्रह..इनका स्थान ले लेते है..!
इस शिति में हम चेतना *सत) की शक्रती से चैतन्यता (सात्विकता) को देखने लगते है..और तामसिक प्रवृत्तिया भाग खडी होती है..!
इसप्रकार हम चेतना की शक्ति और योग से सारे कार्य करते है..और कार्य में कुशलता और सफलता प्राप्त करते है.