MANAV DHARM

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Sunday, February 6, 2011

मन मथुरा दिल द्वारिका काया काशी.......!

मन मथुरा दिल द्वारिका काया काशी जान..दसवां द्वारा देहरा तामे ज्योति पहचान..!
..अर्थात..यह मन ही मथुरा है जहां क्रूर राजा कंस विराजते है..दिल ही द्वारिका है..जहां मुरली--मनोहर--गोपी--कृष्णजी विराजते है..मानव शरीर ही काशी है..जहां शिवजी की कृपा से मुक्ति मिलाती है...इस मानव--काया में दसवां--द्वार..यानी तीसरी आँख ही वह दलहीज है जहां हम अपनी जीवन--ज्योति को देख--पहचान--जान सकते है..!!
..कहने का तात्पर्य यह है कि...यह मानव--तन बहुत कीमती है..जिसमे मन बेलगाम घोड़े की तरह है..ह्रदय बहुत कोमल है क्योकि वहा पर सत्य--नारायण--परमात्मा का निवास है..यह शरीर ही मुक्ति प्राप्त करने का साधन है ..और "आज्ञा--चक्र" (उपनयन) ही ज्योति--स्वरूप परमात्मा को देखने--पहचानने की दलहीज (दरवाजा) है..!
..धन्य है हम सब भक्त--गण जिन्हें यह दुर्लभ मानव--तन प्रभु की अहेतु की कृपा से मिला है..हमें निरंतर भजन--सुमिरन करना चाहिए..!!

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